हैरान हूं

पंछियों के रूप से,ऑ हर सुबह की धूप से,
कोयल की मीठी कूक से,दिल में उठती हूक से,
हैरान हूँ !! हैरान हूँ !!
दिल में छुपी कटार से दुनियाँ की मीठी मार से,
पत्थर पै चढ़ते हार से,हो क़रम की गुहार से,
हैरान हूँ !! हैरान हूँ !!
चढ़ती हुई बहार से,ढलते हुए ख़ुमार से,
वक़्त की रफ़्तार से, बे-वजह ग़ुफ़्तार से,
हैरान हूँ !! हैरान हूँ !!
दर्द के इज़हार से,कभी बे-वज्ह ही क़रार से,
यहाँ ज़ख़्म बे-शुमार से ऑ जिस्म-ए-ज़ार-ज़ार से,
हैरान हूँ !! हैरान हूँ !!
उफ़ ज़िन्दगी की हार से,ऑ मौत के वक़ार से,
लुटती हुई बहार से,सजते हुए मज़ार से,
हैरान हूँ !! हैरान हूँ !!....
उर्मिला माधव...
23.9.2014..

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