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Showing posts from November, 2018

बतानी पड़ेगी

हक़ीक़त हमें अब बतानी पड़ेगी, तुम्हें ग़म से बाज़ी लगानी पड़ेगी, तुम्हें याद होगा, कभी हम मिले थे, वही बात तुमको भुलानी पड़ेगी, कहाँ तक तअक़्क़ुब में फिरते रहेंगे तबीयत सभी से हटानी प...

उड़ाई गई

उसकी गलियों की बात आई-गई, खाक़ इस दिल की फिर उड़ाई गई.. कितनी शर्मिंदगी से गुज़रा किये, उसकी तसवीर साथ पाई गई, इक अजब शक़्ल से मुखातिब थे, आईना दे के जो दिखाई गई, मैं हूँ क़िरदार उस कहान...

थाम कर

हमने अपनी धड़कनों को थाम कर, उससे थोड़ी ज़िन्दगी क्या मांग ली, वो मगर कुछ भी न बोला देर तक, और जब बोला तो बस इतना कहा, आप हमसे इस क़दर क्यूं बोलते हैं..... उर्मिला माधव 29.11.2018

जहां हूँ मैं

सब ये कहते हैं, बे अमां हूँ मैं, फ़िर भी महफूज़ हूँ,जहां हूँ मैं, ख़ुद को ज़ाहिर नहीं किया मैंने, दुनियां कहती है इक ज़बाँ हूँ मैं, न तो पर्दों का इस्तेमाल किया, और न सोचा के कब कहां हूँ ...

सड़क पर रहने वाले युवक की मनोव्यथा-----

अनुष्ठान जब कोई होता, मेरा मन भीतर से रोता , मेरे पास कमीज़ नहीं थी, कोई मुझे तमीज नहीं थी, कहीं अगर जो बाजे बजते , मेरे ख्वाब चौगुने सजते, मन पंछी तब खूब उछलता, जाने को ये खूब मचलता, ...

उछाल कर

वो जा चुके हैं बज़्म से,इज्ज़त उछाल कर, मैंने भी रख दिया है अभी गम संभाल कर, ख़ुद ही जवाब दूं ये कहाँ फिक्र है मुझे, हालात सच को लायेंगे बाहर निकाल कर, काँटों पे लिख रही हूँ अभी आबलों ...

शाइर हो गए

इस जहाँ में जाने कितने ऊंचे शाइर हो गए, उम्र भर गुमनाम थे,फिर मर के ताइर हो गए, अब कलम की धार के मानी कहाँ,बंदानवाज़, दिन चुकाए ज़िन्दगी के मर के ज़ाहिर हो गए, उर्मिला माधव.. 24.11.2016

सोई नहीं

कल तुम्हारी याद आई,रात भर सोई नहीं, अश्क़ अपना रो रहे थे,मैं मगर रोई नहीं, क्या कहूँ दामन न जाने कैसे गीला हो गया, होश कायम रह गए बस मुख़्तसर खोई नहीं.. उर्मिला माधव.. 24.11.2016

क्यों नहीं रहती

मुझको परवाह क्यों नहीं रहती ? लब पे कोई आह क्यों नहीं रहती? कोई इज़हार-ए-इश्क़ करता रहे, दिल में कोई राह क्यों नहीं रहती ? भाते रहते हैं कितने चेहरे मगर, कोई भी चाह क्यों नहीं रहती? ...

खदंग

हम ज़मीं खोद के देखेंगे,कहाँ पहुंचा खदंग, उसने माहौल में .कुछ खाक़ उड़ा रख्खी है .... एक मदारी जो बजाता है,डुगडुगी अपनी, उसने तरक़ीब से बस भीड़ जुटा रख्खी है, उर्मिला माधव... 24.11.2016

झुकने लगीं

कितनी ऊंची बोलियां,बाजार में लगने लगीं, इक शजर की डालियां थक हार कर झुकने लगीं, जाने कैसा शख़्स था किरदार से गिरता गया, और हवा के शोर से बदनामियाँ डरने लगीं, कुछ दिनों आलम रहा भ...

पढ़ के देखिए

खुद आईने के आगे ज़रा पड़के देखिये, चेहरा किताब है तो ज़रा पढ़के देखिये, गैरों पे हंस रहे हैं मियाँ बे-वज्ह ही आप , ख़ुद की भी फितरतों से ज़रा लड़के देखिये, ख़ुरशीद के तले जो जले दूर हैं वो ...

प्रतिकूल है

मृत्यु को हम क्रूर कहते......ये हमारी भूल है, येही जीवन चक्र है तब किस तरह प्रतिकूल है?? जन्म के ही साथ मृत्यु सर्वथा निश्चित यहाँ, सत्यता से बचके चलना हर तरह...निर्मूल है... उर्मिला म...

कम हो रहा है

न ये दर्द-ए-दिल ही ख़तम हो रहा है, के अब सब्र मेरा भी कम हो रहा है, के आँखें बरसने-बरसने को आयीं, ये दिल भी अजब है कि नम हो रहा है, मुझे खुद पै हंसने को जी है बहुत ही, खुदा से भी बढ़के सनम ह...

प्यार लिख दूँ

दिल तो शर्माता है फिर भी,तुम कहो तो प्यार लिख दूँ, और तुम्हारे दिल के आगे,अपने दिल की हार लिख दूँ ? प्यार के इन दायरों में बंध के रहना है तो मुश्किल, पर किसी दीवार के कोने में इक इज़...

आज़ाद नज़्म-- कुत्ते की आवाज़

बहुत दूर कहीं एक कुत्ते के कराहने की आवाज़, बहुत वीराना सा लगता है, दहशत सी लगती है, सूखे पत्तों की आहट, जैसे कोई अँधेरे में चलता हो, ज़िन्दगियों का जायज़ा लेने निकलता हो, वहशत होत...

ख़म निकाले हैं बहुत

ग़म ही ग़म तो अपने दिल में हमने पाले हैं बहोत, क्योंकि सब खुशियों के दर पे यूँ भी ताले हैं बहोत, क्यों रखें हम राबिता,दुनियां के झूठे रंग से, जिसने चाहा उसने हम में ख़म निकाले हैं ब...

नज़्म--शक़्ल देखी

तुमने उसकी शक़्ल देखी, जिसपे लिख्खा था वजूद? कनखियों से देख कर भी, .........देखता कोई न था, दिल ही दिल में मुस्कुरा के, उसने ये सोचा के शायद, आलिमों की भीड़ में .लिख्खा-पढ़ा कोई न था उर्मिला ...

क़रार जाता रहा

आह में टीस भी रही शामिल, रात दिल का क़रार जाता रहा, चांदनी बार-बार आती रही, कोई रह-रह के जब बुलाता रहा, उर्मिला माधव.. 20.11.2017

अज़ाब लगे

मुस्कुराना भी जब अज़ाब लगे, ज़िन्दगी दम-ब-दम सराब लगे, चलना फिरना तो मेस्मरेज़म है जैसे ख़ाबों में कोई ख़ाब लगे, सुब्ह होती है इक करिश्मा सी, उसपे दुनियां अजब हबाब लगे, उर्मिला माध...

धुआं

धुंआ,क्रेमेटोरियम से उठता हुआ, बहुत शोर आग की लपटों का, शादी,बगल के घर में, यानि ख़ाना आबादी, बहुत शादमा हर कोई बजते हुए ढोल ताशे, नाचते हुए लोग, सच क्या है,दोनों में से? क्या श्मश...

नईं ऐं

कोई अपना, भैये नईं ऐं, अपने पास रुपइये नईं ऐं, कैसी दुनियादारी भइया, जो गाड़ी में पहिये नईं ऎं, धोका धड़ी से बढ़िया ये है, प्यार नहीं,तौ कहिये,नईं ऎं, अपनी भी तौ अना है आख़िर, तुमसे कुछ ...

दहलीज़---फ्री वर्स

हम चेहरा नहीं, एक मुखौटा हैं, बचपन खोते हुए, जवानी की दहलीज़ बदलते हुए मानदंड यानि एक बेटी, ज़िन्दगी, एक सौदा, क्या लेंगे आप? बेटी के इलावा ? धन ? या हमारा सारा सुकून संकोच न करें, के...

हलचल

मेरे होने से मच गई हलचल, जब मेरी आंख हो गई जलथल, ज़ेह्न बस लौटने को कहता था, एक ख़्वाहिश थी रुक गई उस पल, मैं अकेली ऑ भीड़ ज़्यादा थी, दिल में हर चंद हो गई खलबल, इम्तेहां सब्र का हुआ ज़ाहि...

तर्जुमानी हो गई

मौत की जब मेजबानी होगई, ज़िन्दगी की तर्जुमानी होगई, जो हकीक़त थी अभी तक रु-ब-रु, टुक पलक झपकी कहानी होगई, सांस जब तक थी तभी तक गुफ्तगू, दफअतन ही बे-जुबानी होगई, क्यूँ ये दुनिया रोज़ ...

जुदा उनसे होके

बहुत ग़मज़दा थे जुदा उनसे होके, गुज़रती थी हर इब्तेदा उनसे होके, मेरा इश्क़ था इन्तेहाई मुक़द्दस, नहीं रह सका अलविदा उनसे होके, बड़ी मिन्नतों से जिसे मैंने भेजा लो रूठा सा निकला ख़ु...

मेरे साक़ी

मेरे साक़ी शोखिये रिन्दाना आकर देख ना, बे-अदब हाथों में है पैमाना,आकर देख ना,.... रंग-ए-महफिल देखने के वास्ते ही आ ज़रा, हर सलीकेमंद का चिल्लाना,आकर देख ना, हर कोई मैकश का जामा ओढ़ कर झ...

संगाती रे

जो भाषा तुझको है आती,मुझको नहीं वो आती रे, पावन प्रीत सहज है मुझ में मेरी यही है थाती रे, तेरे मन में पूरी दुनियां,मेरे मन में केवल तू , छल प्रपंच में रचा बसा तू,मेरा नहीं संगाती र...

करता भी क्या

एक तसल्ली के सिवा मजबूर दिल करता भी क्या? मर तो पहले ही चुका था,और फिर मरता भी क्या? ek tasallii ke sivaa ,majboor dil karta bhi kya, mar to pahle hi chuka tha or phir marta bhi kya, दर्द लेकर दर-ब-दर,फिरते रहे जब उम्र भर, आख़री लम्हों में आख़िर ज़ख्म ये भरता भी क...

ख़ूबी नहीं--- फ्री वर्स

ख़ूबी नहीं,ख़ामी है, पहचान आदमी की जन्म लेती हैं मुश्किलें, चेहरा पढ़ने से, मुश्किल है निबाह, भारी पड़ती हैं, समझदारियाँ, बड़ी ख़ूबी है, ना समझ हो जाना, कितना मुश्किल है समझदारी को ज...

अख़बार पढ़े हो बाबूजी

क्या कल का अख़बार पढ़े हो बाबूजी ? दुनियां का व्यभिचार पढ़े हो बाबूजी? सच बतलाना,क्या-क्या पढ़के आए हो, इक कमसिन की हार पढ़े हो बाबूजी ? दिन भर कोरी बातें करते फिरते हैं, कुल दुनियां ब...

क़ामिल मेरा

ज़िंदगी भर तो दुखाया दिल मेरा, देख ले आकर दिले बिस्मिल मेरा, तंग दिल है तू,मुझे कोई ग़म नहीं, मुझ को देखेगा महे क़ामिल मेरा, उर्मिला माधव.. 16.11.2016

क्या-क्या चाहिए

आसमां कहता है ? ज़र्रा चाहिए ? और दिल से पूछ क्या-क्या चाहिए ? मुझपे ज़ाहिर है तेरा जुगराफिया, आईना तुझको भी देखा चाहिए.., उर्मिला माधव, 16.11.2016

एक मेरी छाती है

एक यही बात तो रह-रहके दिल में आती है, नेज़े ही नेज़े हैं और एक मेरी छाती है, मेरी मजलूम सी ख्वाहिश का वली कोई नहीं, दिल के कहने को हर इक बात रही जाती है, यूँ भी सोचा के हवा से ही शुरू कर...

तमाशा न किया

कोई हीलः न किया,कुछ भी तमाशा न किया, मैंने बस इतना किया हश्र का जलवा न किया, तेरी बातों की अदा मुझको धमक देती रही, मैंने बस इतना किया गैर से चर्चा न किया... तूने दुश्मन की तरह पूरे ...

कुर्सी वाले बाबूजी

चमत्कार को नमस्कार है,कुर्सी वाले बाबूजी राव रंग सब निर्विकार है,कुर्सी वाले बाबूजी रंजू वंजू रीता गीता रोज नाचतीं आँगन में मद्यपान है और बहार है,कुर्सी वाले बाबूजी राग ...

सनम किसीका

अजब तमाशा है आशिक़ी का, नज़र किसीकी सनम किसीका, ज़ुबान शीरीं,फ़रेब दिल में, न कोई समझे है ग़म किसीका, उर्मिला माधव

तोड़ दूँ क्या

Guftgu ka silsila hii tod dun kya ? Har kisise raabita hi chhod dun kya? Ye hawayen raas to aati nahin, Apne hathon rukh hawa ka mod dun kya? Urmila Madhav... 13.11.12

कतरा रहा है

हर इशारा उस जहां से आ रहा है, आदमी जिस सम्त से कतरा रहा है, खोल सांसों पर चढ़ाना ग़ैर मुमकिन, है वही जो अब तलक होता रहा है, पर लकीरों के फ़क़ीरों की ये दुनियां, तोड़ने वाला बहुत हंसता र...
जिस्म को इस तरहा सुलाते थे, ख़्वाब आते थे, लौट जाते थे

खाते हुए

हम हंसे थे फ़रेब खाते हुए, ख़ूब रोया वो मुस्कराते हुए,

वृंदावन हो जाता है

जब याद तुम्हारी आती है तो घर सावन हो जाता है, स्वर मुखर तुम्हारा होते ही मन वृन्दावन हो जाता है, छवि मधुर तुम्हारी इतनी है,क्या जानूं कितनी है सीमा, जब प्रेम सहित वंदन करलूं यह...

सताते हो

बस यूँ ही..... खुद ही तो सताते हो, फिर रूठ भी जाते हो, पर्दा भी नहीं करते, न ही सामने आते हो, उस्लूब भी उल्फ़त का, खुद ही न निभाते हो, ज़ाहिर ही नहीं करते , हर बात छुपाते हो, जैसे भी मसाइल है...

मर जाते हैं

उनसे मिलते हैंं तो ग़म और बिखर जाते हैं, अब तो ये है के ख़यालों से भी डर जाते हैं, कैसे हाथों की लकीरों को लिखा क़ुदरत ने, इस पे गर सोच भी लेते हैं तो मर जाते हैं, उर्मिला माधव

कजनमा लगो हो

😊😊 नोट---- किसी व्यक्ति विशेष स्थान जाति,धर्म से कोई ताल्लुक़ नहीं... ************************************************ मियाँ तुम कभू तो मुसलमां लगो हो, कभू हमको बिलकुल सजनमा लगो हो, हमारी सहेली बताती थी हमको, के रिश्ते म...

सकते हैं

कितनी मुश्किल में डाल सकते हैं, दिल को कितना संभाल सकते हैं, वक़्त हम कितना टाल सकते हैं कितनी दुनियां खंगाल सकते हैं उर्मिला माधव

नवाज़िश है

लोग कहते हैं.....भई,नवाजिश है, ये भी तो एक तरह की साजिश है, लफ्ज़ शीरीं जुबां.........शहद जैसी, दिल के अन्दर अजब सी खारिश है,  जब कभी ये.....उफ़क भी रोता है, हंस के कहते हैं लोग.....बारिश है, मुझसे मिल...

खुशियां मुबारक

तुमने हमसे कब कहा,खुशियाँ मुबारक? खालिक-ए-आबाद की दुनियाँ मुबारक, वास्ते अपने फ़क़त इतना ही वाज़िब? तालिब-ए-अहबाब की सदियाँ मुबारक? उर्मिला माधव... 9.11.2014...

आकलन होते नहीं ---फ्री वर्स

दुखों के आकलन होते नहीं, कौन गिन पाया है, गिरते आंसुओं को? दर्द को किसने हथेली पर रखा है? कौन सोचे क्या है क़ीमत आंसुओं की, आँख की किस्मत कहाँ लिख्खी है बोलो इस तरह सदियां गुज़ार...

संभलना सीख गए

रोते रोते संभलना सीख गए, अपने पैरों पे चलना सीख गए, हम तो पर्दे के पीछे रहते थे, घर से बाहर निकलना सीख गए, अब तो सूरज की तरहा चलते हैं, शाम होते ही ढलना सीख गए, शिकवा ग़ैरों से क्यों ...

नहीं बाक़ी

न ये बाक़ी, न वो बाक़ी, कोई जल्वा नहीं बाक़ी, वो हमको याद आते हैं के जो ज़िंदा नहीं बाक़ी, ज़मीं पे पांव रखने का, किसीको होश तब आया, के जब दुन्या-ए-फ़ानी में कोई रुतबा नहीं बाक़ी, ख़ुदी महफूज़ ...

ज़रेब रखते हैं

वो जो चेहरे पै ज़ेब रखते हैं, दिल में ख़ासा फरेब रखते हैं, ऐसी दुनियां को क़ुफ़्र कहते हैं, दिल में हम भी ज़रेब रखते हैं... उर्मिला माधव... 8.11.2014... ज़ेब--- खूबसूरती, ज़रेब---शिकन...

खुसूं है

सूरत का सुकूं ये नहीं,सीरत का सुकूं है, ये वो ही अदा है के मुझे जिसका जुनूं है, दिल-दिल सा रहे भी तो हो लबरेज़ वफ़ा से, काँटों सा बदन होगा यही इसका खुसूं है, उर्मिला माधव... 8.11.2014...

अजीब लगता था-- नज़्म

आदमी कुछ अजीब लगता था, ज़िंदगी सा करीब लगता था, उन दिनों दिल का एक आलम था, मुश्किलों का असर ज़रा कम था , उसको देखे से चैन मिलता था, बस खुदा से वो ऐन मिलता था, अपनी दुनियाँ,बहार होती थी, ...

सितम में

यारो मुआफ़ करना हंगामा-ए-सितम में कुछ मुंह से निकल जाए ग़र दर्द के आलम में, अपना सफ़र अभी तक,तय तो नहीं हुआ है, डर-डर के जी रहे हैं हम हार के भरम में, कमज़ोर पड़ रही है,रिश्तों की पायदार...

शामत नहीं है

अभी तक तेरे सर पे शामत नहीं है, ये क्या ज़िन्दगी की निज़ामत नहीं है?? मुहब्बत किसीसे अगर हो ही जाए , वो बस हादसा है नियामत नहीं है , जो दिल आगया ग़र तुम्हारा किसीपे , तो फिर एक दिन भी सल...