झुकने लगीं

कितनी ऊंची बोलियां,बाजार में लगने लगीं,
इक शजर की डालियां थक हार कर झुकने लगीं,

जाने कैसा शख़्स था किरदार से गिरता गया,
और हवा के शोर से बदनामियाँ डरने लगीं,

कुछ दिनों आलम रहा भरपूर जश्न-ए-ज़ीस्त का,
फिर रुख़-ए-गुलज़ार पर बेज़ारियां दिखने लगीं..

आबरू से खेल करना,खेल ख़ुद से है जनाब,
दह्र के उस पार से चिंगारियां उठने लगीं,
उर्मिला माधव

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