अख़बार पढ़े हो बाबूजी

क्या कल का अख़बार पढ़े हो बाबूजी ?
दुनियां का व्यभिचार पढ़े हो बाबूजी?

सच बतलाना,क्या-क्या पढ़के आए हो,
इक कमसिन की हार पढ़े हो बाबूजी ?

दिन भर कोरी बातें करते फिरते हैं,
कुल दुनियां बीमार पढ़े हो बाबूजी ?

कितनी चीख़ें पढ़ पाए हो काग़ज़ पर,
कितना हाहाकार पढ़े हो बाबूजी ?

क्या उस पर भी ख़ून के छींटे लिख्खे थे?
किस-किस को मक्कार पढ़े हो बाबूजी ?

दुनियां से अपराध मिटा के रख देंगे,
ये जुमला कै बार पढ़े हो बाबूजी ?

प्यार पे दावेदारी अब भी रखते हो ?
फिर सब कुछ बेकार पढ़े हो बाबूजी,
उर्मिला माधव

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