तर्जुमानी हो गई
मौत की जब मेजबानी होगई,
ज़िन्दगी की तर्जुमानी होगई,
जो हकीक़त थी अभी तक रु-ब-रु,
टुक पलक झपकी कहानी होगई,
सांस जब तक थी तभी तक गुफ्तगू,
दफअतन ही बे-जुबानी होगई,
क्यूँ ये दुनिया रोज़ लगती है नई,
जबकि ये सदियों पुरानी होगई ,
जिनके चर्चे ज़िन्दगी मैं आम थे,
बात उनकी आनी-जानी हो गयी,
उर्मिला माधव..
१७.११.२०१३..
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