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Showing posts from July, 2019

बुंदेली

ऐसे ही एक कोशिश 😊😊😊😊😊 जे कैसौ बतरानौ भओ, समझे नईयाँ?तानौ भओ, बो जो चित्र लगायौ तुमने, बाखौं एक जमानौ भओ, बो तौ हती धरोहर तौ फिर, महफिल में चों लानौ भओ ? उर्मिला माधव.. 1.8.2016

ग़म खा गए

ग़ज़ल तो याद नहीं, पर मतला ज़रूर याद आ रहा है, अपनी कही ग़ज़ल का ---- एक ज़रा सी चोट से घबरा गए 🤔 ? हमको देखो, हम कहां तक आ गए ... उम्र सारी आंसुओं में काट दी, ग़म हुआ तो ग़म में भी ग़म खा गए, उर्मिला माध...

खलने लगी

मुझको अब खलने लगी,बज़्म-ए-अदब की तीरगी, लाख़ ख़्वाहिश ही सही पर ज्यों की त्यों है तिश्नगी, दिल को खुंदक ही हुई,माहौल घटिया देख कर, शाइरी बस नाम है ....पर जा-ब-जा है दिल्लगी.... उर्मिला माध...

नज़्म

रेत के पन्नों पै लिख्खी है कहानी, एक तरफ दरिया का पानी, एक तरफ कुछ जिंदगानी, एक तरफ दुनियाँ-ए-फ़ानी, एक तरफ कुछ नातवानी, एक तरफ हुस्न-ओ-जवानी, एक तरफ बस लनतरानी, एक तरफ शामें सुहान...

हबाब कर डाला

वक़्त कितना ख़राब कर डाला, ख़ुद को ख़ुद ही हबाब कर डाला, तंज़ करना भी एक नशा ही है, सबको नाहक़ जवाब कर डाला, आग कितनी जिगर में रखते थे, जाने क्या-क्या हिसाब कर डाला, ज़िन्दगी उनकी तल्ख़ है ...

फ्री वर्स

तुम कितने अलग हो ना ? बिछड़ जाते हो कितनी आसानी से... और मैं देखती रह जाती हूँ तुमको हैरानी से, मैंने पसीने की बूंदों के साथ, तुमको भी पोंछ दिया पेशानी से, ये बूंदें बहुत परेशान करत...

रोया नहीं

ग़ज़ल... तू मुहब्बत में कभी रोया नहीं, तूने शायद आईना देखा नहीं, वक़्त के चेहरे की देखीं झुर्रियां, क्या दरूँ था ये कभी सोचा नहीं, उम्र भर तड़पे ये तनहा ज़िन्दगी, तूने शायद ऐसा कुछ खोय...

महदूद कर लिए

अब हमने दिल के दायरे महदूद कर लिए, रंज-ओ-अलम ही मंज़िल-ए-मक़सूद कर लिए रुसवाइयों के ज़िक्र पे जो कुछ भी होगया, वो ग़म अना के नाम पर ,महमूद कर लिए, ख्वाहिश तरह-तरह की,हज़ारों तरह के ख़्वाब...

मधुआ के अशआर

देख माँ, है काफ़िला हक़ का घिरा दर क़ातिलान, कैसे देखूँ ......चुप खड़ा हो के ये मैं रह के बईद... जो हमसे पहले आए थे, वो जाने कह गए क्या क्या, कि हम सब पढ़ रहे हैं आज तक, तहरीर मुर्दों की.. दार प...

मैंने कुछ कहा ?

अच्छा बताओ मैंने कभी तुमसे कुछ कहा ? जो भी कहा वो तुम ने कहा मैंने बस सहा, मैं उम्र भर रही हूँ इन्हीं रंज-ओ-ग़म के साथ, सैलाब दुश्मनों का ......मेरे संग ही संग रहा, खुशियाँ तुम्हें मिली...

फ्री वर्स-- रिश्ते

टूट जाते हैं, घने रिश्ते, बेईमानी की चौखट पर, दुनियां गोल है, घूमती रहती हैं, वार्ताएं, दरकती रहती हैं, वर्जनाएं, खिसकती रहती हैं, आस्थाएं, उलझती रहती हैं, चेष्टाएँ, सिसकती रहत...

यारो

जितनी निभती हो उसे दिल से निभालो यारो, वरना कुछ दोस्त नए फिर से बनालो यारो... दोस्ती खेल नहीं इसकी अदा सबको खबर, अपनी बाज़ी को ज़रा ढंग से बिछा लो यारो, आग से आग सुलगती है,कभी बुझती न...

Zamana

आपस का मामला है गैरों को मत जताना, वो दिन कभी न लाना...हंसने लगे ज़माना ..... हम-तुम तो एक ही हैं,गैरों से कैसी निस्बत, मालूम तुमको होगा,लो तुमको क्या बताना... उर्मिला माधव....

शर्मिला ---- अफ़साना

किसी मित्र के जीवन वृतांत पर आधारित--- शर्मीला अविवाहित ही थी,हालांकि ऐसा उसने जान बूझ कर नहीं किया था,संयोगवश ही था .क्यूंकि उसे कोई भी ऐसा इंसान मिला ही नहीं था जो हर तरह से उस...

लाड़ो--- नज़्म

फ़क़त इक लफ्ज़ था 'लाड़ो', जो बस अम्मा ही कहती थीं, खुशी हो,ग़म हो,कुछ भी हो हमेशा ........साथ रहती थीं, अगर तक़लीफ़ ....हम पर हो, तो ....आँखें उनकी बहती थीं, फ़क़त इक लफ्ज़ था "लाड़ो" सो बस अम्मा ही कहती थीं, उर...

देख ले

झूठ है झूठे जहाँ की उंसियत, इसमें सब हारे उलट कर देख ले, क्या बताएं चश्मे तर का माज़रा, वक़्त के धारे उलट कर देख ले, इक से बढ़कर एक तीरंदाज़ थे, मक़बरे सारे उलट कर देख ले.. उर्मिला माधव.. 28.7.20...

तुम नहीं

दिल में कोई बात है और तुम नहीं, आओ देखो रात है और तुम नहीं, दूर मंदिर में .....ये बजती घंटियां, दिल में होतीं हैं अजब सरगोशियाँ, दिल धड़कता है न जाने किसलिए, याद आती हैं ....तुम्हारी शोखि...

29th July 2015 कलाम साहब के नाम

Jul 29, 2015 10:02am आली जनाब मरहूम कलाम साहब के नाम----- ----------------------------------------- एक दिन जाना सभी को है मगर, तेरा जाना किस क़दर है पुर असर!! शख्सियत के चाँद तारे,तुझमें थे, दर्द कितने दे गया तू बे-ख़बर, हर कोई खुद को ही फ...

चटक ले

आने वाली मज़ाहिया ग़ज़ल से----- वक़्त पूरा हो गया है,चल चटक ले, गर्दनें हैं और भी नई  नई लटक ले, बाग़ में कलियाँ नई नित खिल रहीं, मिल ही जायेगी कोई थोड़ा भटक ले..... उर्मिला माधव... 27.7.2016

दिल की हवेली-- नज़्म

एक नज़्म--- बहुत खूबसूरत थी दिल की हवेली, इसी में छुपी है हमारी सहेली, कभी इसकी ख्वाहिश हवाओं में उड़ना, दरख्तों की शाखों पै चढ़ना उतरना, हवाओं की सरगम पे गाना ठुमकना ऑ नदिया की हलच...

गुड्डियां-पटोले

सुर्ख़ जोड़े में सजा कर एक दुलहन भेज दी ज़िंदगी से खेलने को फूलों वाली सेज दी उसकी सारी गुड्डियाँ,सारे पटोले छीन कर उसकी दुनियाँ से ख़ुशी की सारी कलियाँ बीन कर सिर्फ़ तोहफ...

देख ना

मेरे साकी शोखिये रिन्दाना आकर देख ना, बे-अदब हाथों में है पैमाना,आकर देख ना,.... आ ज़रा बस रंग-ए-महफिल देखने के वास्ते, हर सलीकेमंद का चिल्लाना,आकर देख ना, हर कोई मैकश का जामा ओढ़ कर झ...

ख़ला है मुझको

इश्क़ का दायरा एक ख़ास बला है मुझको, इससे बढ़के तो कहीं आज ख़ला है मुझको... सांप अपनी हदों में खुश मिज़ाज होते हैं, इसके बाबत भी पता आज चला है मुझको... -------------------------------------------- ishq kaa dayraa ek khaas balaa hai mujhko, isse badhke to kahin aaj khalaa hai mujhko... saanp apnii hadon main khush mijaaz hote hain, iske baabat bhii pataa ...

बर्फ़ के घर होगए

क्यूँ कोई क़िस्सा करे,ग़म के मुतल्लिक जा-ब-जा , ज़ेहन-ओ-दिल इनसान के अब बर्फ़ के घर हो गए, :::::::: Kyun koii qissa kare,gam ke mutallk jaa-b-jaa zehn-o-dil insaan ke aab barf ke ghar ho gaye, उर्मिला माधव... 26.7.2016

बदतर होगए

Waqt or halaat kitne bad se badtar ho gaye, Qatilaanaa haadse hii rang-e-manzar ho gaye, Main tumhin se poochhti hun ai zamin-o-aasmaaN, Kaun hain wo jinke sab ahsaas patthar ho gaye, Sochtii hun aadmi kii zaat ko kya ho gayaa, Khoon men duube hue sab teer-o-khanjar ho gaye, koi bhi baaqi nahin ab aurten,bachche jawaan, Dard chiikheN or aansu ye hii ghar-ghar ho gaye, Dast andaazi ki himmat jis kisiine ki wahaaN Sab buridah sar hue or zer-e-nashtar ho gaye, Urmila Madhav... 26.7.2016

झींकता क्यूं है

चमन में,फाख्ताएं,बुलबुलें,और खुशबुएँ भी हैं, वो आख़िर चाहता क्या है,हवा में चीख़ता क्यूँ है ?? मुहब्बत के हंसीं जलवे,शह्र के ख़ूब रु मंज़र, उसे सब कुछ मुहैया है,तो इतना झींकता क्यू...

मौसम है बरसात का

भीगे पत्ते, शाखें भीगी मौसम है बरसात का ज़िक्र अँधेरी रात का है ज़िक्र अँधेरी रात का, कभी हवा के झोंके खाकर,खिड़की घर की खुल जाए, दिल की दुनियाँ हिल जाए और अपने आप संभल जाए, खड़ी- खड़ी ...

ज़िक्र अंधेरी रात का

भीगे पत्ते, शाखें भीगी मौसम है बरसात का चर्चा ऐसे मौसम में है, सिर्फ़ अंधेरी रात का, ऐसे भीगे मौसम में है ज़िक्र अँधेरी रात का, कभी हवा के झोंके खाकर,खिड़की घर की खुल जाए, दिल की दुन...

अकड़ते चले गए

सब हिम्मतों को जोड़के लड़ते चले गए, हालात थे कि दिल के बिगड़ते चले गए, दिल अपने रंग में था हम अपने रंग में, दोनों ही अपनी बात पै अड़ते चले गए, रोने से हमको उज़्र था सो रोये भी नहीं,...

पार कर गए

उफ़ ज़िन्दगी के मरहले बीमार कर गए, ऐसा लगा कि ग़म का परस्तार कर गए, दामन में सिर्फ खार हैं.....पैरों में आबले, रस्ता बहुत कठिन था मगर पार कर गए , कुछ आरज़ू थी कुछ थे इरादे भी सख़्त ही, कुछ रा...

बाज़ार क्या

ग़ज़ल---- बख्श देगा हमको ये बाज़ार क्या?? हम बचा पायेंगे अब दस्तार क्या ?? बोलियाँ इज्ज़त की यूँ लगने लगीं, साफ़ ज़ाहिर था के हैं आसार क्या ?? सोच कर हालात हम घबरा गए , हार जाएगा अबस किरदार क...

कर रही हूँ

खुली बग़ावत है ज़िन्दगी से, मैं धड़कनों से मुकर रही हूं, सो अपनी दुनिया संवारने को, जो हो सका है, वो कर रही हूँ, के अब न भाती हैं सर्द आहें, मैं सब दहानों से डर रही हूं, यूँ रूह कहती है अ...

बाज़ार क्या ?

बख्श देगा हमको ये बाज़ार क्या?? हम बचा पायेंगे अब दस्तार क्या ?? बोलियाँ इज्ज़त कीयूँ लगने लगीं, साफ़ ज़ाहिर था के हैं आसार क्या ?? लोग सब आ-आके ये पूछा किये, ज़िंदगी से डर गए हो यार क्या ?? ...

नेज़े ही नेज़े हैं

एक यही बात तो रह-रहके दिल में आती है, नेज़े ही नेज़े हैं और एक मेरी छाती है, मेरी मजलूम सी ख्वाहिश का वली कोई नहीं, दिल के कहने को हर इक बात रही जाती है, यूँ भी सोचा के हवा से ही शुरू कर...

फ्री वर्स--- जुदाई हो

अपने मन को मैंने, बहुत मुश्किलों से, समझाया और फिर, एक रोज़ उसे बुलाया, और वो आया, हवाई घोड़े पर सवार, जाने को कह रहा था, हवाओं सी बातें, वो कभी,बदला नहीं था, उसकी नज़रों में, बहुत मुश्...

फ्री वर्स

स्थित प्रज्ञ जीवन, स्थिर विचार, ज़रा भर को हिलते हैं, पर----- जिन दरख़्तों की जड़ें गहरी रही हैं, आँधियों के बाद भी ठहरी रही हैं... मैं दरख़्त हूँ,ठहरी हुई सदैव के लिए... उर्मिला माधव, 24.7.2016

बदलना होगा

अब तो हर ख़ाब का नक्शा ही बदलना होगा, हर तख़य्युल को सर-ए-शाम ही ढलना होगा, ज़ेर-ए-जज़्बात है हर बात चुभी नश्तर सी, यूँ के ज़ख़्मों पे नमक, आप ही मलना होगा, उर्मिला माधव 24.7.2018

परे हट जा

मत खेल ज़िन्दग़ी से, हटजा तू परे हट जा, मरने की तलब क्यों है, हट जा तू मरे हट जा, मैं कब से कह रही हूं, सुनता ही नहीं मेरी, अब भी है वक़्त प्यारे ,हटजा तू अरे!हटजा, उर्मिला माधव 24.7.2018

हासिल न था

एक तो हरगिज़ हमें रहबर तलक़ हासिल न था, उस पै कुछ तेरा सहारा भी महे-क़ामिल न था, रात को एक बज़्म में शिरकत हमारी थी ज़रूर, जाने क्यों ऐसा लगा के हम वहीँ थे,दिल न था, बारहा कई रंग हमसे, ख़ूब ...

देखते ही रह गए

उनको देखा......देखते ही रह गए, ओर उनसे बात दिल की कह गए, इस क़दर शफ्फाक़ थे ओर खूबरू, झिलमिलाती चांदनी थी, बह गए, ये नहीं मालूम,दिल का क्या हुआ, साथ अपने बेख़ुदी थी, सह गए, उनका रंग-ओ-नूर था य...

कर दूं क्या

मैं उसे ब्लॉक-व्लोक कर दूँ क्या ? ज़िन्दगी भर को लॉक करदूं क्या ? उसकी बातों का रंग गाली है, मैं भी कुछ लूज़ टॉक करदूं क्या ? बात कहना मुझे भी आता है, उसकी आवाज़ चौक करदूं क्या ? उर्मिल...

ख़म नहीं साहिब

ग़म तो हमको भी कम नहीं साहिब, वक़्त सा पर मरहम नहीं साहिब, रख के ज़ानूं पे सर को,रोया करें, इतने कमज़ोर हम नहीं साहिब, मुश्किलें हर नफ़स मुक़ाबिल हैं, आंख उस पर भी नम नहीं साहिब, हमको मग़...

घबरा गए?

एक ज़रा सी ...चोट से घबरा गए? हमको देखो हम कहाँ तक आगए , चांदनी हर बाम पै छिटकी रही, हम ही कसदन तीरगी में आगये, जुम्मा-जुम्मा आठ दिन के हो मियाँ, पथ्थरों से किसलिए टकरा गए !!!! देख लो मुड़न...

नहीं आते

पहले आते थे अश्क़ आंखों में, अब किसी बात पर नहीं आते, तुझको आह-ओ-फुगां से देखा है, हम तिरी ज़ात पर नहीं जाते, सोच के तुझको दिन गुज़ार लिया, बात हम रात पर नहीं लाते... उर्मिला माधव 22.7.2018

छोटा सा है

चल रे पगले तू अभी छोटा सा है, बाज़ुओं के घेर में नन्हा सा है, तू बहुत प्यारा सा है ये सच तो है, पर दिमाग़ी तौर पर, बच्चा सा है तेरा क़द दस फ़ीट लंबा है तो क्या, पर समझ में तू बहुत कच्चा सा ह...

बन कर चले

इस ज़मी पर आसमां बन कर चले, हम अकेले "कारवां"बन कर चले... जो भी जी में आगया सच कह दिया, अपने हर्फ़ों की जुबां बन कर चले, यूँ समझ लो मील का पत्थर भी ख़ुद, और ख़ुद ही पासबां बन कर चले, मर्सिया ...

आसमां बनकर चले

इस ज़मी पर आसमां बन कर चले, हम अकेले "कारवां"बन कर चले... जो भी जी में आगया सच कह दिया, अपने हर्फ़ों की जुबां बन कर चले, यूँ समझ लो मील का पत्थर भी ख़ुद, और ख़ुद ही पासबां बन कर चले, मर्सिया ...

आए कहां से

एक शख़्स जो गुज़रा है अभी दौर-ए-गराँ से, तकता है उसी राह को ....हम आए कहाँ से ? भारी है बहुत जिस्म मगर ये तो हो मुमकिन, हल्की सी रहे जान .....जब ये जाए जहां से, उर्मिला माधव, 21.7.2017