नेज़े ही नेज़े हैं
एक यही बात तो रह-रहके दिल में आती है,
नेज़े ही नेज़े हैं और एक मेरी छाती है,
मेरी मजलूम सी ख्वाहिश का वली कोई नहीं,
दिल के कहने को हर इक बात रही जाती है,
यूँ भी सोचा के हवा से ही शुरू करते हैं,
फिर ख़याल आया कहीं ऐसे कही जाती है?
पासे ग़म ,रस्म-ए हया और हज़ारों मुश्किल,
कैसे बतलाऊं ये आदत ही नहीं जाती है,
मेरी बीनाई सभी दूर से तकती ही रही,
ग़म का दरिया है मेरी लाश बही जाती है......
#उर्मिलामाधव...
24.7.2015
नेज़े--- भाले
मजलूम---अनाथ,
पासे अदब--- अदब का लिहाज़,
रस्मे हया---शर्म की रीति,
बीनाई--- दृष्टि...
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