दिल की हवेली-- नज़्म
एक नज़्म---
बहुत खूबसूरत थी दिल की हवेली,
इसी में छुपी है हमारी सहेली,
कभी इसकी ख्वाहिश हवाओं में उड़ना,
दरख्तों की शाखों पै चढ़ना उतरना,
हवाओं की सरगम पे गाना ठुमकना
ऑ नदिया की हलचल पे जी भर मचलना
इरादों से नापें ज़मीं आसमां सब,
किसी एक पल में, न जाने कहाँ कब?
ये ऐसी सहेली है थकती नहीं है,
बहुत मुश्किलों में भी रुकती नहीं है,
इसे लोग दरअस्ल कहते "तबीयत"
कोई बोले ख़ाहिश,कोई बोले नीयत,
मगर डर गया दिल यकायक हमारा,
के जिस रोज़ अम्मा ने हमको पुकारा,
वो बोलीं ये दुनिया बड़ी बेरहम है,
सह्ल इसको कहना तुम्हारा वहम है,
इसी उम्र से तुमको होगा संभलना,
ये हँसना-हँसाना,ये इठला के चलना,
अभी तुमने देखा नहीं है ज़माना,
वो शोहदों के जुमले,चलन वहशियाना,
भुला देंगे पल भर में हँसना हँसाना,
नहीं जानते कोई रिश्ते निभाना,
अभी वक़्त रहते संभल जाओ तुम भी,
ग़लतफ़हमियों से निकल जाओ तुम भी,
वगरना ये दुनियां ही जीने न देगी,
मुहब्बत के प्याले को पीने न देगी,
सिया का वतन है,ये रज़िया का घर है,
जिसे आह से वाह तक सब ख़बर है,
उर्मिला माधव.....
27.7.2016
Comments
Post a Comment