शर्मिला ---- अफ़साना
किसी मित्र के जीवन वृतांत पर आधारित---
शर्मीला अविवाहित ही थी,हालांकि ऐसा उसने जान बूझ कर नहीं किया था,संयोगवश ही था .क्यूंकि उसे कोई भी ऐसा इंसान मिला ही नहीं था जो हर तरह से उसके मन भा जाता फिर भी लोग यही समझते थे कि वह शादी की ख्वाहिश ही नहीं रखती थी.शाम के वक़्त वो किन्ही बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने के लिए जाती थी.बीच में एक नदी के किनारे से उसे गुज़रना होता था .कभी-कभी जब ज़ियादः मन भारी होता था तो वो नदी के किनारे बैठ जाया करती थी ...
एक दिन वो यूँ ही कुछ अनमनी सी बैठी हुई थी क्यूंकि उसके पड़ोस में एक बंगाली महिला का देहांत हो गया था जो काफी बुज़ुर्ग थीं और उसको उनसे बहुत प्यार था.
उनके नहीं रहने से उसको अनाथ जैसा महसूस हो रहा था क्यूंकि वो खुद भी बंगाली संस्कृति से ही परिचित थी..और वो उसकी बहुत कद्र करती थीं.शर्मिला बहुत हुनर मंद थी.जैसे उनकी साड़ियाँ काढती रहती थी और वो बुज़ुर्ग महिला जिनका नाम वृंदा देवी था उसको बंगला गीत सुनाती रहती थीं जिससे उसका मन लगा रहता था.माता पिता उसके कोलकाता में रहते थे जिनकी वो इकलौती संतान थी .अपने सीने पर पत्थर रख कर उन्होंने उसे पढने के लिए दिल्ली भेज दिया था...लेकिन यहाँ बुज़ुर्ग महिला से बहुत जुड़ गई थी और माता पिता की दूरी खलती नहीं थी.
लेकिन आज उसका मिज़ाज ही उखड गया था .वो सोच रही थी ऐसे ही एक दिन दादी छोड़ गई थीं और आज वृंदा देवी उसको अनाथ करके चली गई थीं और ये सोचते-सोचत उसे बहुत रुलाई आने लगी और वो ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी ..उसे ये भी ध्यान नहीं रहा के वो जगह सुनसान हो गई थी और अँधेरा घिर आया था.
दुःख उसका था,चुप भी उसको खुद ही होना था और वो चुप होगई...
आख़िरकार घर तो जाना ही था और अपने कमरे में वापस आई तो उसे मन ख़ाली-ख़ाली सा लगने लगा...
दुसरे दिन कॉलेज गई लेकिन जी नहीं लगता था ....
क्रमशः ....
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