ख़म नहीं साहिब

ग़म तो हमको भी कम नहीं साहिब,
वक़्त सा पर मरहम नहीं साहिब,

रख के ज़ानूं पे सर को,रोया करें,
इतने कमज़ोर हम नहीं साहिब,

मुश्किलें हर नफ़स मुक़ाबिल हैं,
आंख उस पर भी नम नहीं साहिब,

हमको मग़रूर मत कहो हरगिज़,
क्यूंकि गरदन में ख़म नहीं साहिब,

हमसे त्यौरी चढ़ाके बातें करे,
अच्छे-अच्छों में दम नहीं साहिब,
उर्मिला माधव...
23.7.2017
जानूँ--घुटना
ख़म-- टेढापन,तिरछापन
नफ़स--सांस
मगरूर--घमंडी

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