मधुआ के अशआर

देख माँ, है काफ़िला हक़ का घिरा दर क़ातिलान,
कैसे देखूँ ......चुप खड़ा हो के ये मैं रह के बईद...

जो हमसे पहले आए थे, वो जाने कह गए क्या क्या,
कि हम सब पढ़ रहे हैं आज तक, तहरीर मुर्दों की..

दार पे चढ़के भी उसका ज़िक्र है दर ख़ासो आम,
वो फ़ना तो हो गया है, ..........बेअसर होता नहीं....

हमसफ़र कहते हैं किसको, दोस्त किसका नाम है,
साया है बस साथ अपने और सफ़र का साथ है...

आँखों में हैं अश्क़ हमारी .......सीने पर हैं दाग़ बहुत,
अहले इश्क़ ओ अहले अज़ा को कौन नहीं पहचानेगा ?

दीद की है चाह हमको, मौत हो के ज़िन्दगी,
आज हम ज़ेरे कफ़न सो के भी देखेंगे उन्हें...

ये मेरे इश्क़ की दौलत है ऊंची कस्र ए सुल्तां से,
जो अपनी सारी दौलत को यहीं पर छोड़ जाता है...

कौन है ये जिसको सारे, ज़लज़ले,करते सलाम,
जिसके आगे झुक रहा है फ़लक सारा, कौन है..?

इक तरफ है लाश बेसर इक तरफ गोर ओ कफ़न,
ग़र सभी हैं बेमकां, ......तो क़स्र किसके काम का...?

तारीफ़ करते हैं कुत्ब-ओ-कलम की, जो करते हैं बातें भी रंज-ओ-अलम की
हैं अपनी मुहब्बत को बाज़ार करते, मैं करता हूँ उनको समझने की कोशिश....
मधुवन ऋषिराज
30.7.2016

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