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Showing posts from July, 2024

ख़ुद को जोड़ा है

बिखरी बिखरी साँसों में भी ख़ुद को ख़ुद से जोड़ा है, हमको पर कुछ ख़ास समझ कर हर लम्हे ने तोड़ा है, दिल को ये एहसास बहुत है क्या खोया क्या पाया है, कभी मगर सब जान बूझ कर तूफ़ानों पर छोड़ा है.. उर्मिला माधव.. 1.8.2013

निगाहे नाज़ का सदक़ा

nigah-e-naaz ka sadqa utara hai abhi hamne, faqat deedar ki khatir pukara hai abhi hamne, hamara dil hamara hai,tumhare dil ki tum jano, nazar sabki bacha kar dil sanwara hai abhi hamne.. Urmila Madhav .. 1.8.2013

दूसरा कोई नहीं

अपनी ज़ाती ज़िन्दगी में,बाख़ुदा कोई नहीं, जो भी कुछ थे आप थे बस,दूसरा कोई नहीं, कितने लम्बे रास्ते तनहा किये तय उम्र भर, सबका इस्तकबाल था पर नाख़ुदा कोई नहीं, सब अकेले ही उठाते अपनी वीरानी का बार, कुल दहर का ये चलन है,बांटता कोई नहीं, रोज़-ए-महशर सामने है और खड़े हैं रु-ब-रु, इसकी मंजिल इन्तेहा है इब्तेदा कोई नहीं, आह भी याहू की जौलानी सी लगती है मुझे, इसलिए अब उससे बढ़कर या खुदा कोई नहीं, -------------------------------------------------- apnii zaatii zindagii main,baakhudaa koii nahin, jo bhii kuchh the aap the bas dusra koii nahin, kitne lambe raaste tanhaa kiye tay umr bhar, sabkaa istaqbaal tha par na-khudaa koii nahin, sab akele hii uthaate,apnii veeraanii kaa baar, kul dahar kaa ye chalan hai,baant-taa koii nahin, roz-e-mahshar saamne hai or khde hain ru-b-ru, iskii manzil intehaa hai,ibtedaa koii nahiin, aah bhii yaahoo kii jaulaanii sii lagtii hai mujhe, isliye ab us-se badhkar,yaa khudaa koii nahin... उर्मिला माधव.... 1.8.2014.

कभी रोया नहीं

तू मुहब्बत में कभी रोया नहीं, तूने शायद आईना देखा नहीं, वक़्त के चेहरे की देखीं झुर्रियां, क्या दरूँ था ये कभी सोचा नहीं, उम्र भर तड़पे ये तनहा ज़िन्दगी, तूने शायद ऐसा कुछ खोया नहीं.... दास्तां कहता है आधी रात की, पूछ उससे जो कभी सोया नहीं, आँख से टपका लहू,चस्पां रहा, दाग़ फिर दिल का कभी धोया नहीं.. #उर्मिलामाधव... 30.7.2015...

महदूद कर लिए

अब हमने दिल के दायरे महदूद कर लिए,  रंज-ओ-अलम ही मंज़िल-ए-मक़सूद कर लिए  रुसवाइयों के ज़िक्र पे जो कुछ भी होगया, वो ग़म अना के नाम पर ,महमूद कर लिए, ख्वाहिश तरह-तरह की,हज़ारों तरह के ख़्वाब, ज़िन्दान-ए-ज़ीस्त हो गये,मसदूद कर लिए, होता नहीं यकीं तो ज़ियारत भी क्या करें, अपने ही दिल के रास्ते,मसजूद कर लिए, उर्मिला माधव... 30.7.2016 ज़ियारत---- तीर्थाटन  महमूद---प्रशंसा  मस्जूद---पूज्य  मसदूद--- क्लोज्ड, रोका हुआ  मसऊद---प्रसन्न,पवित्र  मक़सूद--- उद्देश्य,इच्छित

मैंने कुछ कहा?

अच्छा बताओ मैंने कभी तुमसे कुछ कहा ? जो भी कहा वो तुम ने कहा मैंने बस सहा, मैं उम्र भर रही हूँ इन्हीं रंज-ओ-ग़म के साथ, सैलाब दुश्मनों का ......मेरे संग ही संग रहा, खुशियाँ तुम्हें मिलीं तो रहे दुश्मनों के पास, दरिया-ए-अश्क़ जब भी बहा ..मेरे घर बहा, मैं तो वफ़ा की राह में बिलकुल ज़हीन हूँ, तुम ही ने किये नज्र मुझे ......दर्द बारहा ... जैसी भी जो भी हूँ मैं मगर मोतबर तो हूँ, हर एक की तरफ से फ़क़त ज़ुल्म भर ढहा.... उर्मिला माधव.... 30.7.2016

धारे उलट कर देख ले

झूठ है झूठे जहाँ की उंसियत, इसमें सब हारे उलट कर देख ले, क्या बताएं चश्मे तर का माज़रा, वक़्त के धारे उलट कर देख ले, इक से बढ़कर एक तीरंदाज़ थे, मक़बरे सारे उलट कर देख ले.. उर्मिला माधव.. 28.7.2016

नहीं देखा होगा

मेरी आँखों का समंदर नहीं देखा होगा, खा कसम तूने ये मंज़र नहीं देखा होगा, चश्मे पुरनम जो बरसती है तेरे जाने पर, तूने जाते हए ,मुड़कर नहीं देखा होगा, ग़ैर से मिलता है ओ खुश भी नज़र आता है, उसके सीने में छुपा ख़ंजर नहीं देखा होगा, तुझको कहती हूँ,बरसने पै निरी बारिश भी, न हुआ सब्ज़ वो बंजर नहीं देखा होगा, रात दिन मुझको जो हलकान किये रहता है, मेरे सीने में बवंडर नहीं देखा होगा... उर्मिला माधव... 11.5.2015..

अच्छा है

खुद ही खुद में दिल बहलाना अच्छा है, कभी-कभी का चुप रह जाना अच्छा है, हद से ज़्यादः बात गुज़रना ठीक नहीं, कभी-कभी अहसान जताना अच्छा है, बहुत शराफ़त,इल्ज़ामों की बाइस है, कभी-कभी तूफ़ान उठाना अच्छा है, खुली रहें आँखें और चौकन्ने खूब, कभी-कभी कुछ राज़ छुपाना अच्छा है, आसमान में उड़ना अच्छी बात सही, कभी-कभीकोई ख़ास ठिकाना अच्छा है, जिस्म सजाया जाता देखो रोज़ बहुत, कभी-कभी कोई लहद सजाना अच्छा है, नहीं अगर पहचान हमें सच यारी की, कभी-कभी दुश्मन बन जाना अच्छा है... #उर्मिलामाधव 28.7.2015

है भी नहीं भी है

न जाने क्या है वो अहसास सा इस जिस्म में,है भी,नहीं भी है, न जाने क्या है कुछ हस्सास सा इस जिस्म में,है भी,नहीं भी है, बड़े ही फ़ख़्र से करते हैं इस्तेमाल ये कह कर हमारा है, न जाने क्या है जो है ख़ास सा इस जिस्म में,है भी नहीं भी है, कभी मुर्दार सा होकर पड़ा रहता है कोताही की हालत में, न जाने क्या है एक इतिहास सा इस जिस्म में,है भी नहीं भी है, उर्मिला माधव... 27.7.2016

तो क्या हो

मैं किसी दीवार में चिन जाऊं तो क्या हो? हश्र तक भी ख़्वाब के बिन जाऊं तो क्या हो? मैं बिला ही वज्ह इतना रोऊँ गाऊं किसलिए ग़म, ख़ुशी जो भी हैं सब गिन जाऊं तो क्या हो? आप इस्तक़बाल की ख़ातिर बहुत बेचैन हैं, आप के घर आख़री दिन जाऊं तो क्या हो? उर्मिला माधव

मौसम है बरसात का

भीगे पत्ते, शाखें भीगी मौसम है बरसात का ज़िक्र अँधेरी रात का है ज़िक्र अँधेरी रात का, कभी हवा के झोंके खाकर,खिड़की घर की खुल जाए, दिल की दुनियाँ हिल जाए और अपने आप संभल जाए, खड़ी- खड़ी बस इतना सोचूँ क्या जाने अब क्या होगा,  बिजली चमके आसमान में,डर कर जान निकल जाए, क्या करना है मुझको ऐसी बे-मतलब सौगात का, ज़िक्र अँधेरी रात का,ये मौसम है बरसात का ? उर्मिला माधव, 26.7.2016

डर नहीं गए

हम उम्र भर सफ़र में रहे, घर नहीं गए, बस ख़ैर ये रही कि कहीं मर नहीं गए,

रह रह के दिल में आती है

एक यही बात तो रह-रहके दिल में आती है, नेज़े ही नेज़े हैं और एक मेरी छाती है, मेरी मजलूम सी ख्वाहिश का वली कोई नहीं, दिल के कहने को हर इक बात रही जाती है, यूँ भी सोचा के हवा से ही शुरू करते हैं, फिर ख़याल आया कहीं ऐसे कही जाती है? पासे ग़म ,रस्म-ए हया और हज़ारों मुश्किल, कैसे बतलाऊं ये आदत ही नहीं जाती है, मेरी बीनाई सभी दूर से तकती ही रही, ग़म का दरिया है मेरी लाश बही जाती है...... #उर्मिलामाधव... 24.7.2015 नेज़े--- भाले मजलूम---अनाथ, पासे अदब--- अदब का लिहाज़, रस्मे हया---शर्म की रीति, बीनाई--- दृष्टि...

नक्शा ही बदलना होगा

अब तो हर ख़ाब का नक्शा ही बदलना होगा, हर तख़य्युल को सर-ए-शाम ही ढलना होगा, ज़ेर-ए-जज़्बात है हर बात चुभी नश्तर सी, यूँ के ज़ख़्मों पे नमक, आप ही मलना होगा,

दर्द का सौदा हुआ

इक ज़ख़ीरा मुश्किलों का दिल पे है रख्खा हुआ, और हर इक बज़्म में इस बात का चर्चा हुआ, हम भी ये दिन मुश्किलों से देख पाये हैं हुज़ूर, तीरगी काफ़ूर थी और चांद भी हंसता हुआ, हम अंधेरी रात के किस्से सुना सकते थे बस, आज देखा रात का कुछ रंग सा बदला हुआ, हमको सावन से मुहब्बत सी हुई है दफ़अतन, गोकि अपना बिजलियों से दर्द का सौदा हुआ, उर्मिला माधव

हासिल न था

एक तो हरगिज़ हमें रहबर तलक़ हासिल न था, उस पै कुछ तेरा सहारा भी महे-क़ामिल न था, रात को एक बज़्म में शिरकत हमारी थी ज़रूर, जाने क्यों ऐसा लगा के हम वहीँ थे,दिल न था, बारहा कई रंग हमसे, ख़ूब टकराये ज़रूर जो बहुत दरकार था वो ज़ाहिरे महफ़िल न था, दूर से खुश्बू सी हमको एक आती थी ज़रूर, जिसको हम देखा किये वो दिल तो था बिस्मिल न था... बज़्म थी रंगीं बहुत और रौनकें भी थीं ज़रूर, फिर भी कुछ तो ख़ास था जो उस जगह शामिल न था.... उर्मिला माधव

कुछ और करें

हम तिरे ग़म से उबर जाएं तो कुछ और करें, तेरे ज़ीने से उतर जाएं तो कुछ और करें, अब ये तक़दीर कहीं और अगर ले जाए, इससे पहले ही न मर जाएं तो कुछ और करें, अब तो नश्शे में हुए ग़र्क़ हमें होश कहाँ रंगे उल्फ़त से जो डर जाएं तो कुछ और करें, सारी दुनिया से बहुत अच्छा भटक लेते हैं, इस जुनूं में भी जो घर जाएं तो कुछ और करें, अपनी ख़ाहिश है, जहां भर से अलग चलने की, न किसी दर पा अगर जाएं तो कुछ और करें.. उर्मिला माधव

मुस्कुराना तो है

दिल कहे मत कहे मुस्कुराना तो है, सुर सजे मत सजे गुनगुनाना तो है, ज़िन्दगी इक तमाशा न बन जाए बस घर मिले मत मिले घर को जाना तो है, आईने पर अगर  धूल जम भी गई, अब हटे मत हटे पर हटाना तो है, रात आई तो सब कुछ बिखरने लगा, बस चले मत चले, घर बचाना तो है, उर्मिला माधव

अच्छा लगता है

यूँ तो सब कुछ तितर-बितर और बिखरा लगता है मुझको अपना सावन फिर भी अच्छा लगता है, फूलों पर ,पत्तों पर जो भी,ओस की बून्दें गिरती हैं, रोज़ाना आपस में मिलकर कितनी बातें करती हैं, मन के भीतर भीतर बिलकुल सूना लगता है मुझको अपना सावन फिर भी अच्छा लगता है, बरसातों में,कोयल मीठे गीत सुनाने आती है, मुझसे कितनी जुड़ी हुई है,रोज़ बताने आती है, यादों के ढेरों में सब कुछ फीका लगता है मुझको अपना  सावन फिर भी अच्छा लगता है, हरियाली और बाग़ बगीचे गीले-गीले लगते हैं, दीवारों के कोने बिलकुल सीले-सीले लगते हैं, सावन का रातों से रिश्ता झूठा लगता है मुझको अपना सावन फिर भी अच्छा लगता है, भीगी आँखों से देखा है,मैंने अपने सावन को, कैसे -कैसे भरमाया है,टूटे से बिखरे मन को, आँचल का हर कोना हरदम भीगा लगता है, मुझको अपना सावन फिर भी अच्छा लगता है... उर्मिला माधव

रस्साकशी है

आज मैं ज़िंदा हूँ क्यों के ज़िन्दगी है, वरना मेरी सांस कब की जा चुकी है, मैस्मरेज़म है सो बस चलती हूं मैं जिस्म जां ऑ ज़ेह्न तक में बे खुदी है, आहें भरना और तुझको याद करना, क्या कहूँ जी की अजब रस्सा कशी है, उर्मिला माधव

फ़ुर्सतों के साथ ग़ज़ल

तन्हा सफ़र किया है बड़ी कसरतों के साथ, ख़ुद को शजर किया है बड़ी हिम्मतों के साथ, मुश्किल बहुत थी ज़िन्दगी, और राह भी न थी, ग़म ने असर किया है बड़ी फुरसतों के साथ... कुछ दोस्तों को शुक्र अदा यूं भी कर दिया, हमको ख़बर किया है बड़ी शिद्दतों के साथ.. बर्बादियों का जश्न मना कर भी ख़ुश रहे, सब दर गुज़र किया है बड़ी निस्बतों के साथ.. सदियों से अपने ग़म में यूं ही मुब्तिला रहे, ग़म ही नज़र किया है, नई क़ुरबतों के साथ.. उर्मिला माधव

गुज़रती है

ज़िंदगी रोज़ रोज़ मरती है, चूंकि ये हादसों से डरती है, हमको मालूम है कि क्या होगा, बेहिसी दिल से जब गुज़रती है, कितनी हैरत से इसको देखा है, आख़री आस जब बिखरती है, जो भी क़िस्मत है बे मआनी है, बिल वजह आह वाह करती है, उर्मिला माधव

इज़ाफ़ा हो रहा है

क्यूं तमाशों में इज़ाफ़ा हो रहा है, आदमी अपना अदब क्यूं खो रहा है। इन नई नस्लों को क्या मिल पाएगा अब, जिसको देखो वो तड़प कर रो रहा है। क्या वो सोचे जल गई हो जिसकी दुनियां, ख़ून के छींटे,मुसलसल धो रहा है। एक मुश्किल से जो छूटे गर कोई तो, बीज दूजा ज़ह्र के फिर बो रहा है। किस तरह पहुंचेंगी ये चीखें कहीं पर, कान मूंदे हर पड़ोसी सो रहा है। क्या नज़ारा और मुस्तक़बिल में होगा, जो बुरा है वो बुरा ही तो रहा है। उर्मिला माधव,

मेरा कमाल होगा

जो तूने कर दिया है, तुझको मलाल होगा, तेरा किया ही जब-जब, तुझ पर बहाल होगा, हमको भी ग़म रहेगा ज़ाहिर सी बात है ये, पर तयशुदा यही है, तुझ पर सवाल होगा, अहसास तुझको होगा, महशर के रोज़ आख़िर, जब आखरी सफ़र भी वक़्ते ज़वाल होगा, मैं सह्ल दिल हूं इसको सब दुनिया जानती है, पुरसिश के लफ़्ज़ कहना, मेरा कमाल होगा, उर्मिला माधव

शिद्दत है

तू मेरी आख़री मुहब्बत है, ज़िन्दगी तू है,तू इबादत है, रु ब रु हो मिरी निगाहों के, तुझको छू लूँ अज़ीम शिद्दत है, मेरी ख़ाहिश हैं,तेरे रूह-ओ-जिगर, कब तेरा जिस्म मेरी चाहत है ? मुझपे क़ाबिज़ है तेरी हुस्न-ए-नज़र, तुझको देखूं ये मेरी आदत है, तू भी छुप जाए है कभी मुझ से, ये तेरी ख़ास इक शरारत है, तुझको देखे जो ग़ैर नज़्र कोई, फिर तो उस शख़्स से बगावत है.. उर्मिला माधव,

माइल नहीं हूँ मैं कहीं

आपकी फ़हरिस्त में शामिल नहीं हूँ मैं कहीं, हां मगर इतना तो है हाइल नहीं हूँ मैं कहीं, आपकी तहज़ीब से, वाबस्ता मैं हरगिज़ नहीं, पर समझ लीजे मुझे जाहिल नहीं हूँ मैं कहीं, आपकी रंगीनियां कितनी भी हों पुरज़ोर पर, देखती सब कुछ हूं पर माइल नहीं हूँ मैं कहीं, उर्मिला माधव

आया जाया कर

ज़िंदगी तू भी मुस्कुराया कर, ग़म से हट के भी दिल लगाया कर, जो हवाओं के शोख़ जल्वे हैं, इनमे कुछ तू भी आया जाया कर, मेरी आँखें जो थक चुकी हैं अभी, इनकी ख़ातिर चराग़ लाया कर, मुझको वहशत है इक ज़माने से, इसके बाहर मुझे बुलाया कर, मैं जो सोती हूँ ग़मज़दा होकर, रोज़ आ आ के तू जगाया कर, ये जो दुनियां के ज़ख़्म मिलते हैं, इनपे गुंचे भी कुछ सजाया कर, ग़म की दुनियां बहुत पुरानी है, कोई नक्शा नया दिखाया कर.. मैं बहुत थक गई हूं रोने से, मेरी दुनियां में हंस के आया कर.. उर्मिला माधव,

किसकी है

उसके घर में मेजबानी किसकी है, आज ये फिर नई कहानी किसकी है, मुझमें-उसमें तीसरे का काम क्या, फैसला हो बे-ईमानी किसकी है? बेकसी और मेरी तनहाई है बस, अब बताये,नातवानी किसकी है? अश्क़ से भीगे हुए आरिज़ मेरे, इस क़दर ये,गुलफ़शानी किसकी है? पहले ही तो ज़ख्म इतने दे दिए, और दिल पै ये निशानी किसकी है? उसका दावा ये के वो मेरा है बस, हंस रही हूँ,लनतरानी किसकी है? मेरा दिल तो बुझ् गया वो देखले, उसकी ग़ज़लों में रवानी किसकी है? मैं तो बरसों हिज़्र से हूँ रु-ब-रु, प्यार में उसके,जवानी किसकी है??  #उर्मिलामाधव... 4.7.2015