आया जाया कर
ज़िंदगी तू भी मुस्कुराया कर,
ग़म से हट के भी दिल लगाया कर,
जो हवाओं के शोख़ जल्वे हैं,
इनमे कुछ तू भी आया जाया कर,
मेरी आँखें जो थक चुकी हैं अभी,
इनकी ख़ातिर चराग़ लाया कर,
मुझको वहशत है इक ज़माने से,
इसके बाहर मुझे बुलाया कर,
मैं जो सोती हूँ ग़मज़दा होकर,
रोज़ आ आ के तू जगाया कर,
ये जो दुनियां के ज़ख़्म मिलते हैं,
इनपे गुंचे भी कुछ सजाया कर,
ग़म की दुनियां बहुत पुरानी है,
कोई नक्शा नया दिखाया कर..
मैं बहुत थक गई हूं रोने से,
मेरी दुनियां में हंस के आया कर..
उर्मिला माधव,
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