अच्छा लगता है

यूँ तो सब कुछ तितर-बितर और बिखरा लगता है
मुझको अपना सावन फिर भी अच्छा लगता है,

फूलों पर ,पत्तों पर जो भी,ओस की बून्दें गिरती हैं,
रोज़ाना आपस में मिलकर कितनी बातें करती हैं,

मन के भीतर भीतर बिलकुल सूना लगता है
मुझको अपना सावन फिर भी अच्छा लगता है,

बरसातों में,कोयल मीठे गीत सुनाने आती है,
मुझसे कितनी जुड़ी हुई है,रोज़ बताने आती है,

यादों के ढेरों में सब कुछ फीका लगता है
मुझको अपना  सावन फिर भी अच्छा लगता है,

हरियाली और बाग़ बगीचे गीले-गीले लगते हैं,
दीवारों के कोने बिलकुल सीले-सीले लगते हैं,

सावन का रातों से रिश्ता झूठा लगता है
मुझको अपना सावन फिर भी अच्छा लगता है,

भीगी आँखों से देखा है,मैंने अपने सावन को,
कैसे -कैसे भरमाया है,टूटे से बिखरे मन को,

आँचल का हर कोना हरदम भीगा लगता है,
मुझको अपना सावन फिर भी अच्छा लगता है...

उर्मिला माधव

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