तो क्या हो
मैं किसी दीवार में चिन जाऊं तो क्या हो?
हश्र तक भी ख़्वाब के बिन जाऊं तो क्या हो?
मैं बिला ही वज्ह इतना रोऊँ गाऊं किसलिए
ग़म, ख़ुशी जो भी हैं सब गिन जाऊं तो क्या हो?
आप इस्तक़बाल की ख़ातिर बहुत बेचैन हैं,
आप के घर आख़री दिन जाऊं तो क्या हो?
उर्मिला माधव
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