आँख के नीचे की काली झाइयां, और सारी उम्र की तन्हाईयाँ घेरती हैं अब सवालों से मुझे, आज गुज़रे वक़्त की परछाईयाँ, यूँ भी कहते ही नहीं बनता है कुछ, जब ये मुझमें खोजें हैं ये रानाईयाँ, जो भी गुज़रा हो मगर इतना रहा, ज़िन्दगी ने नाप लीं गहराइयाँ , पाँव तो हर दम ज़मीं पर ही रहे चश्म-ए-नम से देख लीं ऊँचाइयाँ, दिल मेरा अनहद कहीं सुनता रहा दूर कुछ बजती रहीं शहनाइयाँ ---- #उर्मिलामाधव... 31.10.2015
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Showing posts from October, 2015
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बाज़ार में मात्र चार रुपयों की आती है, वो सिंदूर की डिब्बी, जो बाबू ने मेरे लिए लाखों रुपयों में खरीदी थी, सिंदूर की डिब्बी और जीवन भर की गुलामी का अनुबंध, मुझसे वो घर भी छीना था जिसे मैं अपना समझने की भूल करती रही थी, जहाँ अम्मा थीं,स्नेह शीला, एक सिंदूर की डिब्बी ने उनको भी छीना था, पराई हो जाने का ठप्पा लगाया गया था मेरे ऊपर , जहाँ से आई थी वो मेरा घर नहीं था, जहाँ आई थी वो पराया घर था, बचपन ने यही सुना कर जवानी पर धकेला था,तुम्हें पराये घर जाना है, मेरा मन कभी समझ नहीं पाया, कौन सा घर पराया था ? अम्मा वाला या सिंदूर की डिब्बी वाला ? कितनी बड़ी हो गई हूँ, पर ये दोहरा विषय अभी तक समझ में नहीं आया, मुझे लगता है औरत का कोई घर ही नहीं होता उसकी अपनी कोई पहचान होती ही नहीं यदि है भी तो एक औरत सिर्फ एक औरत, # उर्मिलामाधव 11.9.2015
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मेरे दिल की किताब रहने दे, चुप ही रह हर जवाब रहने दे, चैन मिलना कोई ज़रूरी है ? ऐसा कर ,इज़्तराब रहने दे, आँख रोती हैं जा इन्हें ले जा, मेरे नज़दीक ख्वाब रहने दे, एक चिलमन बहुत है परदे को आने-जाने को बाब रहने दे, तुझको शम्स-ओ-क़मर से तौला था, अपनी इज़्ज़त की ताब रहने दे, तू है मजबूर अपनी आदत से छोड़ बाक़ी हिसाब रहने दे.. ख़ार ख़ुशबू से ख़ूब बेहतर हैं, ले जा अपने गुलाब रहने दे तेरी खुशियां तुझे मुबारक हों, मुझको ख़ाना ख़राब रहने दे,.... # उर्मिलामाधव ... 12.9.2015
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ख़ूब है हिंदी की गलियों का ये फेरा, एक दिन, भित्तियों पर चित्र भी जा कर उकेरा, एक दिन, हर कोई आतुर हुआ इंदौर जाने के लिए देख लेंगे उस शहर का एक सवेरा, एक दिन, देश के व्यवसायी जो अंग्रेज़ियत से चूर हैं, वो भी जायेंगे जमाएंगे ही डेरा,एक दिन, भारती चलचित्र की अभिव्यक्तियाँ हिंदी में हैं, लिखके रोमन में पढ़ेंगे देश मेरा, एक दिन.... क्या है वंदे मातरम्,ये पूछ कर देखो कभी, कस के देखो बस ज़रा हिंदी का घेरा एक दिन... तोड़ कर भागेंगे रस्सा और कहेंगे माय गॉड, भूल ही जाएंगे आख़िर तेरा-मेरा एक दिन... # उर्मिलामाधव 14.9.2015
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सामने हो भी और नहीं भी हो, ये जो घेरे तुम्हारी यादों के, किस तरह घेर कर खड़े हैं सब, इतने ज़िद्दी हैं घर नहीं जाते, नींद कहती है हम नहीं आते, रात है,तीरगी है,तन्हाई, और क्या-क्या लिखा है हाथों में आज तो बात बस शहर की है पर जुदाई तो उम्र भर की है, नाम सांसों पै लिख लिया तो क्या, बात किस्मत की तो जुदा सी है तुमको जाना है,गम को आना है मुझको बेमन भी मुसकुराना है और अपना कहाँ ठिकाना है बिन तुम्हारे ही जीते जाना है सांस रुक जाये,सब बिखर जाये तुमको मुड़के कभी न आना है तुमको मुड़के कभी न आना है मुझको बस यूँ।ही जीते जाना है # उर्मिलामाधव 16.9.2015
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डूबते सूरज की समझे नातवानी तो मैं जानूँ, और अपनी छोड़ दे ये हुक्मरानी तो मैं जानूँ बादशाहत के नशे में चल रहा है झूम कर तू, बिन नशे के जी ज़रा ये ज़िंदगानी तो मैं जानूँ, हो गए गद्दीनशीं तो मार दी दुनियां को ठोकर, सरहदों पर झोंक दे अपनी जवानी तो मैं जानूँ, ग़ैर मुल्कों में उड़ी हैं धज्जियाँ अपने वतन की, चिंदियों पर लिख कोई अच्छी कहानी तो मैं जानूँ ख़्वाब देना आसमां के,कौनसी खूबी है इसमें, दे ज़रा अपने वतन को कुछ निशानी तो मैं जानूँ, # उर्मिलामाधव ... 14.5.2015...
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अदब अब सभी के दफ़ा हो गए हैं, बुज़ुर्गाने आला ख़फा हो गए है, समेटे नहीं जा सके दिल के टुकड़े, ये हिस्से भी कितनी दफ़ा हो गए हैं, सिखाई मुहब्बत-ऑ-तहज़ीब जिनको, जवां क्या हुए,........बे-वफ़ा हो गए हैं, मुहब्बत के मानी बचे ही कहाँ कुछ, फ़क़त अब ज़ियाँ और नफ़ा हो गए हैं.... वो सर को झुकाना ऑ तस्लीम कहना, किताबों का बस फ़लसफ़ा होगये हैं, # उर्मिलामाधव ... 5.10.2015
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उसने चाहा था वो लिखा जाये, इससे बेहतर है ....मर्सिया गाये दिल मगर इन्तिख़ाब करता है अब किसीसे न कुछ कहा जाये झूठ से पुर असर तबस्सुम क्या, इब्न-ए-आदम पै हर गिला जाए, किसकी अब बानगी तलाशे दिल, ख़ाक़ दरिया में जब बहा आये, अब ये तबियत कहीं नहीं लगती, इस तरह कब तलक चला जाए, अपनी मुठ्ठी में ख़ाक़ रखते हैं, ज़िन्दगी तुझसे क्या मिला जाए.. # उर्मिलामाधव 11.10.2015
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वो आदमी वही है,लहजा बदल गया है, अब दरमियां हमारे,क़िस्सा बदल गया है, wo aadmii wahi hai,lahjaa badal gayaa hai, ab darmiyan hamaare qissa badal gaya hai, हम मुन्तज़िर रहे हैं,आने की कह गया था, गिनते हैं उँगलियों पर,हफ्ता बदल गया है, ham munzir rahe hain aane kii kah gaya tha, ginte hain ungliyon par haftaa badal gaya hai, लगता है कुछ कमी है,पहचान में हमारी, या वक़्त के मुताबिक चेहरा बदल गया है, lagta hai kuchh kamii hai,pahchan main hamaari, ya waqt ke mutabik chehra badal gaya hai, उल्फ़त का रंग लेकर आया हमारे दिल में, हैरत से देखते हैं, कैसा बदल गया है, ulfat ka rang lekar aaya hamaare dil main, hairat se dekhte hain,kaisa badal gaya hai, मजबूरियां हैं,तुझको,रब के किया हवाले, किस-किसको ये बताते,क्या-क्या बदल गया है... majbuuriyaan hain tujhko,rab ke kiya hawaale, kis-kis ko ye bataate,kya-kya badal gaya hai... # उर्मिलामाधव , 12.10.2015
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ये मेरे भीतर की गहराई और गहरी होगई जिजीविषा ठहर गई हो जैसे कुछ सोचती नहीं सोचना चाहती भी नहीं इतिहास डसने लगता है स्कूल की पेरेंट्स मीटिंग हमेशा सताया जिसने मुझे पापा...... ये लफ़्ज़ कभी कहा ही नहीं पिता के साथ लिपटते हुए मेरे हमजोली मेरी सूनी आँखें शून्य में और शून्य हो गईं # उर्मिलामाधव 16.10.2015
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दोस्त कहाँ होते हैं मालूम नहीं, दुःख को दुःख की तरह समझने वाले कहाँ होते हैं जो प्यार के अहसास को निर्भरता का नाम नहीं देते कहाँ होते हैं ऐसे लोग मालूम नहीं बरसों पहले किसीके मुंह से ये लफ़्ज़ पहली बार सुना था ब्रीदिंग स्पेस... जिससे कहा गया उसने भोलेपन में समझा ही नहीं मेरे लिए भी नया था लेकिन आज मैं इसके मानी ख़ूब जानती हूँ इसे दामन छुड़ाना कहते हैं अंग्रेजी है ये हमारी समझ से दूर ऐसे घुमावदार लफ़्ज़ अच्छे नहीं सच और साफ कह देना ज़ियादा ठीक था मुझे अगर ये लफ़्ज़ जब भी सुनना ही पड़ जायेगा प्रीफर करुँगी भूलना उम्र भर का ऐसे अल्फ़ाज़ रिश्तों के मज़ाक उड़ाते से लगते हैं यानि घुटन कोई क्यों बर्दाश्त करे बेहतर हो.... चलो एक बार फिर से अजनबी बन जांय क्योंकि मुझे ख़ामोशी फूलों जैसी नहीं लगती चिकनी बातें करना मुझे नहीं आता,कभी आया भी नहीं और आना भी नहीं है अच्छा है बहुत ये एकला चालो रे... # उर्मिलामाधव 16.10.2015
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ब्रिज ग़ज़ल ------ जिंदगी भर जो गुरूरी आग में जरतौ रह्यौ, मर्द और बईयर में खाली फर्क ही करतौ रह्यौ, कैसे-कैसे हैं परेखे मेरे मन में का कहूँ, भीतरई-भीतर करेजा टूट कें गिरतौ रह्यौ, माँ बहन बेटी हतीं सबरी घरई में ताऊ पेँ, अपनी दुनियां में अकेलौ आप ही मरतौ रह्यौ, मेरी बातन में छुपौ है जिंदगी कौ सार सब, आत्म कलुषित मांस्स अपने आप ते डरतौ रह्यौ, ऐसी दुनियां देखि कैं जे चित्त उचटत जातु ऐ, यों समझ लेओ जीउ मेरौ आह सी भरतौ रह्यौ.. # उर्मिलामाधव .. 18.10.2015
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एक नज़्म--- बहुत खूबसूरत थी दिल की हवेली, इसी में छुपी है हमारी सहेली, कभी इसकी ख्वाहिश हवाओं में उड़ना, दरख्तों की शाखों पै चढ़ना उतरना, हवाओं की सरगम पे गाना ठुमकना ऑ नदिया की हलचल पे जी भर मचलना इरादों से नापें ज़मीं आसमां सब, किसी एक पल में, न जाने कहाँ कब? ये ऐसी सहेली है थकती नहीं है, बहुत मुश्किलों में भी रुकती नहीं है, इसे दरअसल लोग कहते हैं "तबियत", कोई बोले ख्वाहिश,कोई बोले नीयत, मगर डर गया दिल यकायक हमारा, के जिस रोज़ अम्मा ने हमको पुकारा, वो बोलीं ये दुनिया बड़ी बेरहम है, सहल इसको कहना तुम्हारा वहम है, इसी उम्र से तुमको होगा संभलना, ये हँसना-हँसाना,ये इठला के चलना, अभी तुमने देखा नहीं है ज़माना, वो शोहदों के जुमले,चलन वहशियाना, भुला देंगे पल भर में हँसना हँसाना, नहीं जानते कोई रिश्ते निभाना, अभी वक़्त रहते संभल जाओ तुम भी, ग़लतफ़हमियों से निकल जाओ तुम भी, वगरना ये दुनियां ही जीने न देगी, मुहब्बत के प्याले को पीने न देगी, सिया का वतन है,ये रज़िया का घर है, जिसे आह से वाह तक की ख़बर है, # उर्मिलामाधव .. 18.10.2015
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जो उसे करना था उसने कर लिया, मैंने बस इलज़ाम अपने सर लिया, फासले दिल में मुक़म्मल हो गए, और दामन इक धुंए से भर लिया, मुतमईन कोई हो गया उससे बहुत, मैंने हिस्से में महज़ एक डर लिया, सोचती रहती हूँ ......अब तन्हाई में, इस क़दर क्यों फैसला बदतर लिया, गुफ्तगू का वक़्त भी आया बहुत, मैंने मौजू,जान कर, दीगर लिया... खुश रहा वो भी मुझे कम आंक कर, दिल मेंरा उसपे फ़क़त हंस भर लिया... # उर्मिलामाधव .. 18.10.2015
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तुम कौन हो,मैं नहीं जानती, आज भी नहीं और शायद कभी नहीं जानती थी, अजनबी मिलते हैं, बिछुड़ जाते हैं, मिलन के साथ बिछुड़न ही क्रम है हादसों में जानें चली जाती हैं जिन्दा इंसान मुर्दा हो जाते हैं क्या वो मिल सकते हैं हमारे लाख चाहने पर भी ? नहीं ना ? तुम्हीं कहो कितना लंबा धैर्य रखा जाता है कभी लौट कर न आने तक अब मुझे कोई बेचैनी नहीं होती किसीके न आने की कौन इस जंजाल में फंसना चाहता है ठीक होता है चैन की नींद सोना रचनाएँ जन्म लेती हैं इससे और तुम तो लिख नहीं सकते एक लफ़्ज़ भी कवि थोड़े ही हो कैसे जानोगे भावनाएं कैसेआहत होती हैं तकलीफें लिखना सिखाती हैं धार्मिक भी नहीं हो तुम विश्वास का तुमसे कोई नाता नहीं वरना शिवजी की जटाओं से बहती गंगा,जो तुम मुझे हमेशा दिखाया करते थे उसे खुद क्या देख नहीं लेते ? तुमने ही कहा था न ? विश्वास भी एक भावना है क्यों विश्वास की बुनियादें हिल गईं तुम्हारी, बोलो चुप क्यों हो ? पर नहीं मैं जानती हूँ तुम नहीं बोलोगे, विश्वास जो हिल गया तुम्हारा तुम वो आदमी ही नहीं हो जो हुआ करते थे चलती हूँ.... # उर्मिलामाधव 21.10.2015
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बाज़ार में मात्र चार रुपयों की आती है, वो सिंदूर की डिब्बी, जो बाबू ने मेरे लिए लाखों रुपयों में खरीदी थी, सिंदूर की डिब्बी और जीवन भर की गुलामी का अनुबंध, मुझसे वो घर भी छीना था जिसे मैं अपना समझने की भूल करती रही थी, जहाँ अम्मा थीं,स्नेह शीला, एक सिंदूर की डिब्बी ने उनको भी छीना था, पराई हो जाने का ठप्पा लगाया गया था मेरे ऊपर , जहाँ से आई थी वो मेरा घर नहीं था, जहाँ आई थी वो पराया घर था, बचपन ने यही सुना कर जवानी पर धकेला था,तुम्हें पराये घर जाना है, मेरा मन कभी समझ नहीं पाया, कौन सा घर पराया था ? अम्मा वाला या सिंदूर की डिब्बी वाला ? कितनी बड़ी हो गई हूँ, पर ये दोहरा विषय अभी तक समझ में नहीं आया, मुझे लगता है औरत का कोई घर ही नहीं होता उसकी अपनी कोई पहचान होती ही नहीं यदि है भी तो एक औरत सिर्फ एक औरत, #उर्मिलामाधव 11.9.2015
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अदब अब सभी के दफ़ा हो गए हैं, बुज़ुर्गाने आला ख़फा हो गए हैं, समेटे नहीं जा सके दिल के टुकड़े, ये हिस्से भी कई-कई दफ़ा हो गए हैं, सिखाई मुहब्बत-ऑ-तहज़ीब जिनको, जवां क्या हुए,........बे-वफ़ा हो गए हैं, मुहब्बत के मानी बचे ही कहाँ कुछ, फ़क़त अब ज़ियाँ और नफ़ा हो गए हैं.... वो सर को झुकाना ऑ तस्लीम कहना, किताबों का बस फ़लसफ़ा होगये हैं, #उर्मिलामाधव... 5.10.2015