ब्रिज ग़ज़ल ------
जिंदगी भर जो गुरूरी आग में जरतौ रह्यौ,
मर्द और बईयर में खाली फर्क ही करतौ रह्यौ,
जिंदगी भर जो गुरूरी आग में जरतौ रह्यौ,
मर्द और बईयर में खाली फर्क ही करतौ रह्यौ,
कैसे-कैसे हैं परेखे मेरे मन में का कहूँ,
भीतरई-भीतर करेजा टूट कें गिरतौ रह्यौ,
माँ बहन बेटी हतीं सबरी घरई में ताऊ पेँ,
अपनी दुनियां में अकेलौ आप ही मरतौ रह्यौ,
मेरी बातन में छुपौ है जिंदगी कौ सार सब,
आत्म कलुषित मांस्स अपने आप ते डरतौ रह्यौ,
ऐसी दुनियां देखि कैं जे चित्त उचटत जातु ऐ,
यों समझ लेओ जीउ मेरौ आह सी भरतौ रह्यौ..
#उर्मिलामाधव..
18.10.2015
भीतरई-भीतर करेजा टूट कें गिरतौ रह्यौ,
माँ बहन बेटी हतीं सबरी घरई में ताऊ पेँ,
अपनी दुनियां में अकेलौ आप ही मरतौ रह्यौ,
मेरी बातन में छुपौ है जिंदगी कौ सार सब,
आत्म कलुषित मांस्स अपने आप ते डरतौ रह्यौ,
ऐसी दुनियां देखि कैं जे चित्त उचटत जातु ऐ,
यों समझ लेओ जीउ मेरौ आह सी भरतौ रह्यौ..
#उर्मिलामाधव..
18.10.2015
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