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Showing posts from August, 2016
Waqt or halaat kitne bad se badtar ho gaye,  Qatilaanaa haadse hii rang-e-manzar ho gaye,  Main tumhin se poochhti hun ai zamin-o-aasmaaN,  Kaun hain wo jinke sab ahsaas patthar ho gaye,  Sochtii hun aadmi kii zaat ko kya ho gayaa,  Khoon men duube hue sab teer-o-khanjar ho gaye,  koi bhi baaqi nahin ab aurten,bachche jawaan,  Dard chiikheN or aansu ye hii ghar-ghar ho gaye,  Dast andaazi ki himmat jis kisiine ki wahaaN  Sab buridah sar hue or zer-e-nashtar ho gaye,  Urmila Madhav... 26.7.2016
दामन-ए-दश्त से बाहर क्या निकल पाएंगे,  बात इतनी सी है क्या फिर न इधर आएंगे?  आते-जाते हुए लोगों को यहाँ देखा बहुत,  सोचती हूँ के यहाँ आ के किधर जाएंगे?  रूह-ए-ज़िंदान तो रह-रह के सदा देती है,  है कशिश दश्त की हर बार फिसल जाएंगे,  लाख़ कोशिश हो मगर है ही नहीं,रद्दो बदल,  सांसें जितनी भी हैं गिनती की हैं,मर जायेंगे, आबले,ज़ख़्मी जिगर,और न जाने क्या-क्या,  ये वो असबाब हैं, घर भर में नज़र आएंगे,  अब रही साथ की कोई साथ कहाँ होता है ?  देखना सिर्फ़ ये है,कब ये बदल जाएंगे... उर्मिला माधव...
किस तसल्ली की दुआ करते हो तुम, ज़ख्म ही तो बस छुआ करते हो तुम, ख़ैर ख्वाहों में तो ....हरगिज़ हो नहीं, हो रहो ..जो कुछ हुआ करते हो तुम, इसको रब ने कीमती कर के दिया, ज़िन्दगी को बस जुआ करते हो तुम.. उसकी चाहत क्यूँ तुम्हें दरकार है, जिसके हक़ में,बद्दुआ करते हो तुम... जो भी दिल को दे सके हो आज तक, आबलों को मजमुआ करते हो तुम, ‪#‎ उर्मिलामाधव‬ , 26.6.2016
हम अकेले कितने क़ाबिल हो गए !! इतने सारे ग़म जो हासिल हो गए !! वक़्त किसको था के देखें और सुनें, सब के सब आके,मुक़ाबिल हो गए, बा-अदब कुदरत ने भी की दुश्मनी, हादसे हर चन्द शामिल हो गए, सामने लश्कर में आये लोग सब, हर तरह से हम ही बातिल हो गए, बोलना हमने कभी जाना नहीं, सो ब-खुद ही अपने क़ातिल हो गए, मुश्किलों में जो न थे शामिल कभी, बस दुआ देकर ही आदिल हो गए .... ‪#‎ उर्मिलामाधव‬ ... 8.9.2015
सहारा, भ्रम ही तो है, मिल जाना किसीका, बहुत बार मिल जाना, और फिर फिर मिलना, साये की तरह बिछुड़न भी तो है ही, कहाँ भूले जाते हैं ? क्रम है, तलाश की शुरुआत, रफ़्तार जारी रखना, पर हवाएँ पीछा करती हैं, उड़ा ले जाती हैं, पुराने नैन नक्श, कितना भी जोड़ें, धुंधले से हो जाते हैं, हम नए में खो जाते हैं, तन्द्रा के साथ, जब तक होश आये, उड़ा ले जाती है हवा, नए नैन नक्श भी, फिर अकेले होना है, स्वयं को भिगोना है, आधी-आधी रातों में आती-जाती यादों से, दो चार होना है, क्रम है..... उर्मिला माधव.. 2.7.2016
क्या बताएं,किस तरह हम संग उसके हैं जिए, जब हदों के पार जाकर तंज़ उसने हैं किये, बरसरे महफ़िल,तमाशा बन गए,ये भी हुआ, बे-सबब ही,ज़ह्र के सब रंग हमने हैं पिए, होगये हलकान,अपने आपसे,लड़कर बहुत, दायरे खुशियों के रोकर,तंग हमने हैं किये, ये समझ में आ गया,महदूद रहना ठीक है, घर की अलमारी में रखके,बंद करने हैं दिये, बस के रूह-ए-ज़ेह्न में आबाद कीं तन्हाईयाँ, ख़ुद ही ख़ुद से बात करके दर्द अपने हैं जिए उर्मिला माधव, 1.7.2016
इश्क़ का...ज़लज़ला नहीं था कभी क्यूंकि दिल आशना नहीं था कभी, इतना समझो के बस निबाह किया, दरमियाँ सिलसिला नहीं था कभी, उसके चेहरे का बस लिहाज़ किया, उसमें दिल मुब्तिला नहीं था कभी, बा-वफ़ा हो......या बे-वफ़ा हो वो मुझको उससे गिला नहीं था कभी, अपना मसकन भी ख़ुद जला लेते, इतना कुछ वलवला नहीं था कभी... उर्मिला माधव... 5.7.2016 मसकन---- घर
आज वो झुंझला रहे हैं,भर रहे हैं आह जी, जो हमारे दर्द-ए-ग़म पर,कर रहे हैं वाह जी, अब हमें वहशत नहीं होती तो बोलो क्या करें, हमको हैरत है के वो क्यों कर रहे हैं चाह जी, हमने जो आंसू पिए हैं,उसका आधा तो पियें वरना खुद क्यूँ दूरियों की कर रहे हैं राह जी, उर्मिला माधव, 9.7.2016
देहल से अपने घर की निकल तो रही हूँ मैं, शाना- ब-शाना आपके चल तो रही हूँ मैं, शमशीर-ओ-तीर लेके भला क्या करोगे तुम? तंज़-ओ-गुरूर देख के जल तो रही हूँ मैं, बज़्म-ए-जहाँ में आई हूँ पर बेख़बर् नही, अपने ही ग़म में रोके संभल तो रही हूँ मैं, अब तज़किरा करूँ भी किसी ग़ैर पै तो क्यों, आब-ओ-हवा के सांचे में ढल तो रही हूँ मैं, मेरी मुख़ालफ़त में हवा तक खिलाफ है, बे-फ़िक़्र होके फिर भी टहल तो रही हूँ मैं... ‪#‎ उर्मिलामाधव‬ ... 10.7.2016
गराँ दिल पे गुज़रा है,गुज़रा ज़माना, यूँ रेगे तपाँ में ........रहा आशियाना, हवाओं ने की उम्र भर ही ख़िलाफ़त, हुआ नेस्तोनाबूद ....अपना ठिकाना, हरे ज़ख़्म लेकर ..हुए दर-ब-दर के, शुरू कर दिया सबने..चेहरा छुपाना, जो जज़्बात जम के हुए पत्थरों से, तो दफ़ना दिया हमने हंसना-हँसाना, जहां भर ने हमसे बहुत दिल्लगी की, कड़ा एक भी हमने फ़िकरा कहा ना, अजब कश्मकश से गुज़रते थे,फिर भी, न कुछ ज़िन्दगी से .......बनाया बहाना, नवाज़े गये .....सिर्फ़ तंज़-ओ-तबर से, बहुत सब्र अपना.......पड़ा आज़माना, फ़क़त सच्ची ज़िद के,बहुत हम धनी थे, जो दिल ने न चाहा......न माना,न माना.... उर्मिला माधव, 11.7.2016
हादसे सुब्ह-ओ-शाम होते हैं, रोज़.....रिश्ते तमाम होते हैं, अपने अखलाक़ पे,नज़र ही नहीं, दाग़........लोगों के नाम होते हैं, जो भी चाहा जुबां से कह डाला, और तब क़त्ल-ए-आम होते हैं, ये जो मजमा लगाया करते हैं, इनके...लफ़्ज़ों के दाम होते हैं, जो हैं दिल से दिमाग़ से शातिर, उनको....झुकके सलाम होते हैं, उर्मिला माधव.... 11.7.2016
देख लो ये उम्र भर की सीढियाँ हैं, तुम भी गिनके इतनी सारी सीढ़ियां चढ़लो तो आओ, दुनियां भर की रास्ते में उलझनें, और मुहैया हों न हरगिज़ सुलझनें, रोते-धोते दिल मसलने का ज़रा कुछ माद्दा रखलो तो आओ, तुम भी गिनके इतनी सारी सीढियां चढ़लो तो आओ, चंद खुशियों को समझ कर ख़ैरियत, ज़िन्दगी भर ज़िन्दगी से मांगनी है माज़रत, और रिसते ज़ख़्म दामन में फ़ना करलो तो आओ, तुम भी गिनके इतनी सारी सीढियाँ चढ़लो तो आओ, रास्ते भर बेकसी और साज़िशों के मरहले, सांस लेना मसअला फिर मसअले पर मसअले, हर क़दम पर आंसुओं का हक़ अदा कर लो तो आओ.. तुम भी गिनके इतनी सारी सीढ़ियां चढ़लो तो आओ, मशवरा ये है हमारा ,ज़िन्दगी में रंग गढ़ लो,मुस्कुराओ, याकि गिनकर इतनी सारी सीढियां चढ़लो तो आओ.... उर्मिला माधव.. 14.7.2016
आजकल के लोग कुछ ज़्यादः सयाने हो गये, साल बेशक हो नया पर हम पुराने हो गए रौशनी बारूद की है,चार सू रंग-ए-क़फ़न, आदमी की ज़िन्दगी में कितने ख़ाने हो गए, इक बिखर जाता है,खींचें,ग़र सिरा हम दूसरा, क्या कहें दामन में अब इतने दहाने हो गए, होगये खामोश,दुनियां के नज़ारे देख कर, लोग ये समझा किये के हम दिवाने हो गए, हमने जब दस्तार रख दी,मंज़िलों के छोर पे, बस फ़लक़ के साए में,अपने ठिकाने हो गए, हम अज़ल से ही रहे बस,इन्तेहाई सादा दिल, दह्र की अय आंधियो ,हम क्यूँ निशाने होगये? उर्मिलामाधव... 15.7.2016
मेरे साकी शोखिये रिन्दाना आकर देख ना, बे-अदब हाथों में है पैमाना,आकर देख ना,.... रंग-ए-महफिल देखने के वास्ते ही आ ज़रा, हर सलीकेमंद का चिल्लाना,आकर देख ना, हर कोई मैकश का जामा ओढ़ कर झूमे यहाँ, मुख़्तसर,गिरता हुआ दीवाना,आकर देखना, हर अदावत में अदाकारी की है बस इन्तेहा, एक लम्हा ही सही पर आना,आकर देख ना, शैख़ है या है बिरहमन,जानना मुश्किल हुआ, कौन कितना होगया मस्ताना,आकर देखना, उर्मिला माधव... 17.11.2013...
यूँ तो सब कुछ तितर-बितर और बिखरा लगता है मुझको अपना सावन फिर भी अच्छा लगता है, फूलों पर ,पत्तों पर जो भी,ओस की बून्दें गिरती हैं, रोजाना आपस में मिलकर कितनी बातें करती हैं, मन के भीतर भीतर बिलकुल सूना लगता है मुझको अपना सावन फिर भी अच्छा लगता है, बरसातों में,कोयल मीठे गीत सुनाने आती है, मुझसे कितनी जुड़ी हुई है,रोज़ बताने आती है, यादों के ढेरों में सब कुछ फीका लगता है मुझको अपना सावन फिर भी अच्छा लगता है, हरियाली और बाग़ बगीचे गीले-गीले लगते हैं, दीवारों के कोने बिलकुल सीले-सीले लगते हैं, सावन का रातों से रिश्ता झूठा लगता है मुझको अपना सावन फिर भी अच्छा लगता है, भीगी आँखों से देखा है,मैंने अपने सावन को, कैसे -कैसे भरमाया है,टूटे से बिखरे मन को, आँचल का हर कोना हरदम भीगा लगता है, मुझको अपना सावन फिर भी अच्छा लगता है... उर्मिला माधव, 20.7.2016
इस ज़मी पर आसमां बन कर चले, हम अकेले "कारवां"बन कर चले... जो भी जी में आगया सच कह दिया, अपने हर्फ़ों की जुबां बन कर चले, यूँ समझ लो मील का पत्थर भी ख़ुद, और ख़ुद ही पासबां बन कर चले, मर्सिया भी ख़ुद-ब-ख़ुद ही पढ़ लिया, ख़ुद-ब-ख़ुद ही नौहा ख्वां बन कर चले, अपने क़दमों को कहीं रोका नहीं, बा अदब वक़्ते रवां बन कर चले... उर्मिला माधव... 21.7.2016
जो मिली गुरु से तुम्हारे,क्या वो दीक्षा छोड़ दोगे?? और किसी परिणाम के भय से परीक्षा छोड़ दोगे?? है समर जीवन भयंकर,साथ कंटक पथ निरंतर, किन्तु क्या प्रारब्ध के भय से प्रतीक्षा छोड़ दोगे?? प्रक्रिया है आत्म विश्लेषण से मत बचना कभी तुम, क्या किसी अपमान के भय से समीक्षा छोड़ दोगे ?? उर्मिला माधव... 20.5.2014...
अपने मन को मैंने, बहुत मुश्किलों से, समझाया और फिर, एक रोज़ उसे बुलाया, और वो आया, हवाई घोड़े पर सवार, जाने को कह रहा था, हवाओं सी बातें, वो कभी,बदला नहीं था, उसकी नज़रों में, बहुत मुश्किल था, मुश्किल है और, मुश्किल ही रहेगा, उम्र भर, मुहब्बत भरी, दुआओं को समझना, हसद के बग़ैर जीना, कीमत समझना, ख़ैर ख्वाही की, दिमाग़ी नसें तंग हो चुकी हैं,उसकी, संकुचित विचार,संकुचित मन, वो ज़िंदगी को जीना नहीं जानता, ख़ानों में बांटता है, और यही उसकी बर्बादी है, ख़ैर जाने दे परवर दिगार, सदियों में एक बार बुलाया था मैंने, मुस्तक़बिल कौन जानता है, ये ही तेरी ख़ुदाई हो, इसीका नाम जुदाई हो.... उर्मिला माधव, 24.7.2016
स्थित प्रज्ञ जीवन, स्थिर विचार, ज़रा भर को हिलते हैं, पर----- जिन दरख़्तों की जड़ें गहरी रही हैं, आँधियों के बाद भी ठहरी रही हैं... मैं दरख़्त हूँ,ठहरी हुई सदैव के लिए... उर्मिला माधव, 24.7.2016
भीगे पत्ते, शाखें भीगी ज़िक्र अँधेरी रात का और मौसम ये बरसात का...... कभी हवा के झोंके खाकर,खिड़की घर की खुल जाती है, दिल की दुनियाँ हिल जाती और अपने आप संभल जाती है, खड़ी- खड़ी बस इतना सोचूँ क्या जाने अब क्या होना है चमक रही है बिजली बैरन ,डर कर जान निकल जाती है क्या करना है मुझको ऐसी बे-मतलब सौगात का, ज़िक्र अँधेरी रात का,और मौसम ये बरसात का ? उर्मिला माधव, 26.7.2016
एक नज़्म--- बहुत खूबसूरत थी दिल की हवेली, इसी में छुपी है हमारी सहेली, कभी इसकी ख्वाहिश हवाओं में उड़ना, दरख्तों की शाखों पै चढ़ना उतरना, हवाओं की सरगम पे गाना ठुमकना ऑ नदिया की हलचल पे जी भर मचलना इरादों से नापें ज़मीं आसमां सब, किसी एक पल में, न जाने कहाँ कब? ये ऐसी सहेली है थकती नहीं है, बहुत मुश्किलों में भी रुकती नहीं है, इसे दरअसल लोग कहते हैं "तबियत", कोई बोले ख्वाहिश,कोई बोले नीयत, मगर डर गया दिल यकायक हमारा, के जिस रोज़ अम्मा ने हमको पुकारा, वो बोलीं ये दुनिया बड़ी बेरहम है, सहल इसको कहना तुम्हारा वहम है, इसी उम्र से तुमको होगा संभलना, ये हँसना-हँसाना,ये इठला के चलना, अभी तुमने देखा नहीं है ज़माना, वो शोहदों के जुमले,चलन वहशियाना, भुला देंगे पल भर में हँसना हँसाना, नहीं जानते कोई रिश्ते निभाना, अभी वक़्त रहते संभल जाओ तुम भी, ग़लतफ़हमियों से निकल जाओ तुम भी, वगरना ये दुनियां ही जीने न देगी, मुहब्बत के प्याले को पीने न देगी, सिया का वतन है,ये रज़िया का घर है, जिसे आह से वाह तक सब ख़बर है, उर्मिला माधव..... 27.7.2016
आली जनाब मरहूम कलाम साहब के नाम----- ---------------------------------------- - एक दिन जाना सभी को है मगर, तेरा जाना किस क़दर है पुर असर!! शख्सियत के चाँद तारे,तुझमें थे, दर्द कितने दे गया तू बे-ख़बर, हर कोई खुद को ही फन्ने खां कहे, तूने बिन बोले दिया,बरपा क़हर वो जो तेरी मुस्कराहट आम थी, क़त्ल सब होते थे जिससे बिन तबर, रात भर का सोग,सुबहा भी यूँ ही, सूने-सूने हो गए,शम्स-ओ-क़मर, पर यूँ ही दुनियां चलेगी बिन रुके, तू न होगा,गम रहेगा .....उम्र भर, क्या सलामी दें,.....शहंशाहे वतन, सांस दे दें,.....लौट जो आये अगर... उर्मिला माधव...
न जाने क्या है वो अहसास सा इस जिस्म में,है भी,नहीं भी है, न जाने क्या है कुछ हस्सास सा इस जिस्म में,है भी,नहीं भी है, बड़े ही फ़ख़्र से करते हैं इस्तेमाल ये कह कर हमारा है, न जाने क्या है जो है ख़ास सा इस जिस्म में,है भी नहीं भी है, कभी मुर्दार सा होकर पड़ा रहता है कोताही की हालत में, न जाने क्या है एक इतिहास सा इस जिस्म में,है भी नहीं भी है, उर्मिला माधव... 27.7.2016
अब हमने दिल के दायरे महदूद कर लिए, रंज-ओ-अलम ही मंज़िल-ए-मक़सूद कर लिए रुसवाइयों के ज़िक्र पे जो कुछ भी होगया, वो ग़म अना के नाम पर ,महमूद कर लिए, ख्वाहिश तरह-तरह की,हज़ारों तरह के ख़्वाब, ज़िन्दान-ए-ज़ीस्त हो गये,मसदूद कर लिए, होता नहीं यकीं तो ज़ियारत भी क्या करें, अपने ही दिल के रास्ते,मसजूद कर लिए, उर्मिला माधव... 30.7.2016 ज़ियारत---- तीर्थाटन महमूद---प्रशंसा मस्जूद---पूज्य मसदूद--- क्लोज्ड, रोका हुआ मसऊद---प्रसन्न,पवित्र
अच्छा बताओ मैंने कभी तुमसे कुछ कहा ? जो भी कहा वो तुम ने कहा मैंने बस सहा, मैं उम्र भर रही हूँ इन्हीं रंज-ओ-ग़म के साथ, सैलाब दुश्मनों का ......मेरे संग ही संग रहा, खुशियाँ तुम्हें मिलीं तो रहे दुश्मनों के पास, दरिया-ए-अश्क़ जब भी बहा ..मेरे घर बहा, मैं तो वफ़ा की राह में बिलकुल ज़हीन हूँ, तुम ही ने किये नज्र मुझे ......दर्द बारहा ... जैसी भी जो भी हूँ मैं मगर मोतबर तो हूँ, हर एक की तरफ से फ़क़त ज़ुल्म भर ढहा.... उर्मिला माधव.... 30.7.2016
मुस्कुराते लब और आँखें गीली लेकर आ गई, एक सहेली,चार दिन में,इश्क़ से घबरा गई, ज़ोर से हंसती थी और आँखों को पोंछे जा रही, और पिछले चार दिन की दास्ताँ बतला रही, क्या बताऊँ किस तरह वो ,ख़ुद को आक़िल कह गया, और सादा दिल मिरा उस गुफ़्तगू में बह गया, कैसेनोवा दिल से था और ज़ाहिरी सूरत ज़हीन, मुत्मईं था कुछ भी कर सकती है ये शक़्ल-ए-हसीन, लफ्ज़ शीरीं और ख़ुद भी था बहुत शीरीं मिज़ाज, बाद उसके क्या हुआ बस वो मैं बतलाती हूँ आज, धीरे-धीरे घूम फिर कर इश्क़ सा फ़रमा गया, यूं समझ लो अय सहेली मुझको भी भरमा गया, ख़ैर अपनी ज़ात से वो बाज़ आता भी तो क्यों, तोड़ डाला दिल को मेरे,पास आता भी तो क्यों, तब अचानक एक दिन आया मगर तनहा नहीं, दिल परेशां हो गया मैं क्या करूँ और क्या नहीं, बेवफ़ाई देखकर दिल जब बहुत बेबस हुआ, सिर्फ़ हंसती ही रही मैं जितना मेरा बस हुआ, बस वही था आख़री लमहा उसे सोचा था जब, मन को यूँ समझा लिया के वो बता,तेरा था कब, हद से ऊपर हो गया तो सब मिटा कर आ गई, और हुजूमे ग़म से आख़िर मैं बहुत घबरा गई.... उर्मिला माधव, 3.8.2016