गराँ दिल पे गुज़रा है,गुज़रा ज़माना,
यूँ रेगे तपाँ में ........रहा आशियाना,

हवाओं ने की उम्र भर ही ख़िलाफ़त,
हुआ नेस्तोनाबूद ....अपना ठिकाना,

हरे ज़ख़्म लेकर ..हुए दर-ब-दर के,
शुरू कर दिया सबने..चेहरा छुपाना,

जो जज़्बात जम के हुए पत्थरों से,
तो दफ़ना दिया हमने हंसना-हँसाना,

जहां भर ने हमसे बहुत दिल्लगी की,
कड़ा एक भी हमने फ़िकरा कहा ना,

अजब कश्मकश से गुज़रते थे,फिर भी,
न कुछ ज़िन्दगी से .......बनाया बहाना,

नवाज़े गये .....सिर्फ़ तंज़-ओ-तबर से,
बहुत सब्र अपना.......पड़ा आज़माना,

फ़क़त सच्ची ज़िद के,बहुत हम धनी थे,
जो दिल ने न चाहा......न माना,न माना....
उर्मिला माधव,
11.7.2016

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