इश्क़ का...ज़लज़ला नहीं था कभी
क्यूंकि दिल आशना नहीं था कभी,

इतना समझो के बस निबाह किया,
दरमियाँ सिलसिला नहीं था कभी,

उसके चेहरे का बस लिहाज़ किया,
उसमें दिल मुब्तिला नहीं था कभी,

बा-वफ़ा हो......या बे-वफ़ा हो वो
मुझको उससे गिला नहीं था कभी,

अपना मसकन भी ख़ुद जला लेते,
इतना कुछ वलवला नहीं था कभी...
उर्मिला माधव...
5.7.2016
मसकन---- घर

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