दामन-ए-दश्त से बाहर क्या निकल पाएंगे, 
बात इतनी सी है क्या फिर न इधर आएंगे? 

आते-जाते हुए लोगों को यहाँ देखा बहुत, 
सोचती हूँ के यहाँ आ के किधर जाएंगे? 

रूह-ए-ज़िंदान तो रह-रह के सदा देती है, 
है कशिश दश्त की हर बार फिसल जाएंगे, 

लाख़ कोशिश हो मगर है ही नहीं,रद्दो बदल, 
सांसें जितनी भी हैं गिनती की हैं,मर जायेंगे,

आबले,ज़ख़्मी जिगर,और न जाने क्या-क्या, 
ये वो असबाब हैं, घर भर में नज़र आएंगे, 

अब रही साथ की कोई साथ कहाँ होता है ? 
देखना सिर्फ़ ये है,कब ये बदल जाएंगे...

उर्मिला माधव...

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