हादसे सुब्ह-ओ-शाम होते हैं,
रोज़.....रिश्ते तमाम होते हैं,
अपने अखलाक़ पे,नज़र ही नहीं,
दाग़........लोगों के नाम होते हैं,
जो भी चाहा जुबां से कह डाला,
और तब क़त्ल-ए-आम होते हैं,
ये जो मजमा लगाया करते हैं,
इनके...लफ़्ज़ों के दाम होते हैं,
जो हैं दिल से दिमाग़ से शातिर,
उनको....झुकके सलाम होते हैं,
उर्मिला माधव....
11.7.2016
रोज़.....रिश्ते तमाम होते हैं,
अपने अखलाक़ पे,नज़र ही नहीं,
दाग़........लोगों के नाम होते हैं,
जो भी चाहा जुबां से कह डाला,
और तब क़त्ल-ए-आम होते हैं,
ये जो मजमा लगाया करते हैं,
इनके...लफ़्ज़ों के दाम होते हैं,
जो हैं दिल से दिमाग़ से शातिर,
उनको....झुकके सलाम होते हैं,
उर्मिला माधव....
11.7.2016
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