देहल से अपने घर की निकल तो रही हूँ मैं,
शाना- ब-शाना आपके चल तो रही हूँ मैं,
शमशीर-ओ-तीर लेके भला क्या करोगे तुम?
तंज़-ओ-गुरूर देख के जल तो रही हूँ मैं,
बज़्म-ए-जहाँ में आई हूँ पर बेख़बर् नही,
अपने ही ग़म में रोके संभल तो रही हूँ मैं,
अब तज़किरा करूँ भी किसी ग़ैर पै तो क्यों,
आब-ओ-हवा के सांचे में ढल तो रही हूँ मैं,
मेरी मुख़ालफ़त में हवा तक खिलाफ है,
बे-फ़िक़्र होके फिर भी टहल तो रही हूँ मैं...
#उर्मिलामाधव...
10.7.2016
शाना- ब-शाना आपके चल तो रही हूँ मैं,
शमशीर-ओ-तीर लेके भला क्या करोगे तुम?
तंज़-ओ-गुरूर देख के जल तो रही हूँ मैं,
बज़्म-ए-जहाँ में आई हूँ पर बेख़बर् नही,
अपने ही ग़म में रोके संभल तो रही हूँ मैं,
अब तज़किरा करूँ भी किसी ग़ैर पै तो क्यों,
आब-ओ-हवा के सांचे में ढल तो रही हूँ मैं,
मेरी मुख़ालफ़त में हवा तक खिलाफ है,
बे-फ़िक़्र होके फिर भी टहल तो रही हूँ मैं...
#उर्मिलामाधव...
10.7.2016
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