अपने मन को मैंने,
बहुत मुश्किलों से,
समझाया और फिर,
एक रोज़ उसे बुलाया,
और वो आया,
हवाई घोड़े पर सवार,
जाने को कह रहा था,
हवाओं सी बातें,
वो कभी,बदला नहीं था,
उसकी नज़रों में,
बहुत मुश्किल था,
मुश्किल है और,
मुश्किल ही रहेगा,
उम्र भर,
मुहब्बत भरी,
दुआओं को समझना,
हसद के बग़ैर जीना,
कीमत समझना,
ख़ैर ख्वाही की,
दिमाग़ी नसें तंग हो चुकी हैं,उसकी,
संकुचित विचार,संकुचित मन,
वो ज़िंदगी को जीना नहीं जानता,
ख़ानों में बांटता है,
और यही उसकी बर्बादी है,
ख़ैर जाने दे परवर दिगार,
सदियों में एक बार बुलाया था मैंने,
मुस्तक़बिल कौन जानता है,
ये ही तेरी ख़ुदाई हो,
इसीका नाम जुदाई हो....
उर्मिला माधव,
24.7.2016

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