ये तो बस अपनी पर्दा दारी है, तुमने क्या बात कब सँवारी है? हाल गैरों से मेरा पूछा किए, वाह क्या ख़ूब ग़मग़ुसारी है ! तल्ख़ लहज़े से बात करना ही, क्या मुहब्बत की आबशारी है? ऐसे शिकवे से कुछ नहीं मानी, जिसमें यकतरफ़ा बात जारी है, तुमको ख़ामोशिय़ाँ मुबारक़ हों, मुझको बस मेरी बेक़रारी है।... Urmila Madhav 22.4.2013
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Showing posts from April, 2016
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यादें---- नज़्म ... रात भर मेरे मुहल्ले में अजब सा शोर था, यूँ लगा जैसे किसीकी चूड़ियों पर ज़ोर था, हाथ डाले हाथ में आपस में बातें कर रहे थे, एक झूठी रस्म को अंजाम देते डर रहे थे, कल सुबह रंगीन चूड़ी लाई थी बाज़ार से, और पहन कर हाथ को देखा बहुत ही प्यार से बे-खबर थी,शाम तक क्या हादसा हो जाएगा, हर किसीका ध्यान उसकी चूड़ियों पर जाएगा, दर्द के रिश्ते कभी मिलते रहे जो प्यार से रस्म के मद्दे नज़र सब होगये बेकार से, मांग की सुर्खी हटा कर लोग समझाने लगे, ज़िंदगी की तल्खियत,बातों से दिखलाने लगे, देखने सुनने की उसको ताब थी बाक़ी कहाँ, थी बहुत हलकान दोज़ख होगया कैसा जहां, अब ज़माने के लिए बस एक मसला ख़ास था चूड़ियाँ पत्थर से फोड़ी जायेंगी एहसास था...... उर्मिला माधव... 22.4.2014...
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राधा रानी ख़ूब है---- कुल दहर में जानी मानी ये कहानी खूब है, साथ मोहन के ये प्यारी राधा रानी खूब है, हैं बसे मुरली की तानों में मधुर मोहन के रंग, उसपे गलियों में किलकती राज रानी खूब है, जो कोई जिस रंग में सोचे मिले वैसा ही रंग, प्यार के रंग में रंगी ये ....राजधानी खूब है, तान सुन के डमरू वाले भी यूँ माइल होगये, क्या कहें भोले की हस्ती पानी-पानी खूब है, एक महलों वाली रानी होश से गफ़िल हुई, सब मिसालों में बड़ी मीरा दिवानी खूब है..... उर्मिला माधव... 7.10.2014
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अब ज़मीं से आसमानों तक के रस्ते छोड़कर, हम चले आये हैं तुमसे सब मरासिम तोड़कर, चाह से और आह तक भी कर दिए हमने दफ़न, चल नहीं सकते हैं हरगिज़ हम जहाँ की होड़ कर, तुमने बस इतना कहा था,छुपके ही मिलना कभी, तुमको देखा ही नहीं फिर आँख अपनी मोड़ कर हम कलेजा साफ़ रख कर ही अबस तुमसे मिले, तुम हमेशा खुश रहे हो इसकी,उससे जोड़ कर ..... वक़्त ही तो है कभी ....उल्टा अगर ये हो गया, बैठ कर रोया करोगे,सर ख़ुद अपना फोड़ कर... # उर्मिलामाधव ... 22.4.2015
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हम निरे अहसास से जूझा किये दिन रात बस, आपने जारी रखे,....अपने मुक़म्मल घात बस, अब्र भी कुछ आदतन बस बर्क बरसाया किया, जिस्म-ओ-जां तनहा रहे कुछ था भी तो हालात बस, हम कभी समझे नहीं क्यूँ कर हसद था आपको, तज़किरा करते रहे क्यूँ बात और बेबात बस आप भी जब दोस्ती के नाम पर धब्बा रहे , झूठ सच के बलबले थे गम की थी इफरात बस कम जगह पड़ने लगी तो होगया हलकान दिल, दम-ब-दम बढ़ती रही सैलाब की तादात बस, इन बलाओं से .....कभी बचना हमें आया नहीं, झोंकते ही रह गए हम अपने सब जज़्बात बस, उर्मिला माधव..
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अब यही हालात हैं,तहज़ीब रक्खी ताक़ पर, रंग में कालक मिलाई और घुमाया चाक़ पर दिल में लाखों मैल लेकर,दिल मिलाने आगये, बे-हयाई का चलन है समझें हैं बेबाक़ पर.... अब वो रंगा-रंग जैसा होलियों का रंग कहाँ, रंग थे होली के गाढ़े,दिल बहुत शफ्फाक़,पर .... वो सुरीले फाग के रंग वो मुग़न्नी अब कहाँ, कौन है बाक़ी मुनक़्क़ीद,ख्वाहिशे,मुश्ताक़ पर, लोग जो जीते थे,ज़ात-ए-किब्रिया के वास्ते, जान दे जाते हैं आख़िर अब हुजूम-ए- शाक़ पर.... अब जुबां का बंद रखना,वक़्त को दरकार है, तज़किरा करना ही क्या अब,हालत-ए-नापाक़ पर, इस तरह दामन बचाना,शोहदों के हाथ से रंग तुम लगने न देना,"महजबीं" पोशाक पर उर्मिला माधव...
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फ़क़त रेशम सी गांठें थीं...ज़रा सी खोल ली जातीं, जो बातें दिल को चुभती थीं,जुबां से बोल लीं जातीं, अगरचे खौफ़ इतना था...कोई दिल पर न लेजाये, कहीं कहने से पहले एहतियातन...तोल ली जातीं, मुहब्बत को सलीके से....निभाना ही नहीं था तब, ज़रुरत क्या थी ऐसी मुश्किलें खुद मोल ली जातीं, फरेब-ओ-मख्र में,फंसना,फंसाना शौक था जिनका, दरीचे झाँकने को तब.........ज़मीनें गोल ली जातीं, किसीका क़त्ल करने को...हुनर की क्या ज़रुरत थी, कि बस हाथों की तलवारें....ज़हर में घोल ली जातीं... उर्मिला माधव...
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राह जो चलनी है इसमें खूबियाँ कोई नहीं, रूह-ए-खुद को छोड़ के वक़्त-ए-गिरां कोई नहीं, दह्र है जलता हुआ और पथ्थरों के आदमी चिलचिलाती धूप है ऑ आशियाँ कोई नहीं, और कितना आज़माना,जो हुआ वो खूब है, तुम वही हो,हम वही राज़-ए-निहां कोई नहीं, है नया कुछ भी नहीं क्यूं इस क़दर हैरां हुए, साथ चलने को तुम्हारे,अय मियाँ कोई नहीं, सामने मक़्तल हुआ लो फ़िक़्र से खारिज़ हुए बस यही रस्ता है...जिसके दरमियाँ कोई नहीं..... उर्मिला माधव, 4.4.2016
नादान सा पंछी --- नज़्म
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चला जाता था अपनी राह पर नादान सा पंछी, शिकारी झुण्ड में आकर,निशाने साध कर बोले, बहुत तुम ख़ूब सूरत हो,तुम्हें ज़िंदा न छोड़ेंगे, के ये परवाज़ रोकेंगे,तुम्हारे पंख तोड़ेंगे, अगर तुम खूबसूरत हो तो ये इलज़ाम तुम पर है, कभी ये आँख मुड़ती है,कभी हम खुद भी मुड़ते हैं, बिना सोचे, बिना समझे तुम्हें बढ़कर पकड़ते हैं, तुम्हारी खूबियों पर रोज़ एक इलज़ाम जड़ते हैं, ग़लत तुम हो नहीं लेकिन,तुम्हीं से हम झगड़ते हैं वो जो एक ख़ास ख़ामी है,हमारी आँख की ही है, बख़ुद हम ही हैं,बदनीयत,मगर फिर भी अकड़ते हैं ... 😊 उर्मिला माधव... 6.4.2016
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तेरा साथ उल्फ़त की शबनम रहेगा, बशर्ते के ता-उम्र बाहम रहेगा, ख़ुसूसी मुहब्बत मिली ज़िन्दगी को, तो यूँ मौत का फिर किसे ग़म रहेगा तजुर्बों ने जो कुछ सिखाया है हमको, वो हो चाहे जितना, मगर कम रहेगा, जुबां से उन्हें आफ़रीं हम कहेंगे, जहाँ तक भी इस जिस्म में दम रहेगा, नहीं फ़िक़्र हमको ज़माने की हरगिज़, ज़माना हमेशा ही बरहम रहेगा, दिल-ओ-जां है क़ुर्बान जिस पे हमेशा, वो हमदम है और सिर्फ़ हमदम रहेगा, उर्मिला माधव ... 7.4.2016
नज़्म--सामने ये चिलचिलाती धूप है
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सामने ये चिलचिलाती धूप है,? या तुम्हारा छद्म वेशी रूप है ? बस इसी जंगल में तुमको देखती हूँ, ख़ुश्क पत्तों को सदायें भेजती हूँ, जब हवा बनकर गुज़रते हो यहाँ से, धीमी सी आवाज़ आती है वहां से, सब के सब इसको बगीचा कह रहे हैं, सबने मिलके इसको सींचा कह रहे हैं, वो जो एक झीना सा पर्दा बीच में है, बस के एक परदेस इसकी सीध में है, धूप में कुर्सी पै सर को टेकती हूँ, और उसी परदे से तुमको देखती हूँ, इसलिए इस धूप से नाता रहा है, तुमको सूरज छू के जो आता रहा है, गर्मियों में ये झुलस कर डर गए हैं, शाख़ और पत्तों के रिश्ते मर गए हैं, मैं मगर तुमसे जुड़ी हूँ उम्र भर को, ढूँढती रहती हूँ,ख़ुद अपनी नज़र को.... :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::: :::::::::: Saamne ye chilchilaati dhoop hai, Ya tumhara chhadm veshi roop hai , bas isi jungle men tumko dekhti hun, khushq patton ko sadaayen bhejti hun, Jab hawa ban kar guzarte ho yahan se, Dhimi sii aawaz aati hai wahan se, Log to isko bagicha kah rahe hain, Sabne milke isko siincha kah rahe hain, Wo jo ek jhee...
नज़्म
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बात ऐसी मैं तुम्हें बतला रही हूँ, ख़ास मंज़िल से उतर कर आ रही हूँ, कुछ धुएं थे और थे बादल बहुत से, आमिरों की शक्ल में पागल बहुत से, कुछ असीरी में बंधे थे ख़ुद ब खुद ही, पाँव भी ज़ंजीर थे सो ख़ुद ब ख़ुद ही, जाने कितने मसअलों पर तज़किरे थे, मेरी नज़रों में तो सब ही सरफिरे थे, सबके चेहरों पर अजब सी वहशतें थीं, बिन बुलाई मौत की सी दह शतें थीं, झूठ किस्से फ़स्ल की बर्बादियों के, बाँट हिस्से अपनी कुछ आबादियों के, मैं नहीं समझी ये कैसे लोग हैं सब!! हंस रहे पर लग रहे पुर सोग हैं सब, पाँव हैं पर चल रहे बैशाखियों पर, और क़दम रख्खे हैं केवल हाशियों पर, # उर्मिलामाधव ... 13.4.2016...
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डूबते सूरज की समझे नातवानी तो मैं जानूँ, और अपनी छोड़ दे ये हुक्मरानी तो मैं जानूँ बादशाहत के नशे में चल रहा है झूम कर तू, बिन नशे के जी ज़रा ये ज़िंदगानी तो मैं जानूँ, हो गए गद्दीनशीं तो मार दी दुनियां को ठोकर, सरहदों पर झोंक दे अपनी जवानी तो मैं जानूँ, ग़ैर मुल्कों में उड़ी हैं धज्जियाँ अपने वतन की, चिंदियों पर लिख कोई अच्छी कहानी तो मैं जानूँ ख़्वाब देना आसमां के,कौनसी खूबी है इसमें, दे ज़रा अपने वतन को कुछ निशानी तो मैं जानूँ, # उर्मिलामाधव ... 14.5.2015... नाम--- उर्मिला माधव जन्मस्थान--- आगरा एम.ए.---संगीत (तबला) 25अक्टूबर... किताब--- बात अभी बाक़ी है... द्वारा--- बोधि प्रकाशन....
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ये सभी कहते हैं,दुनियां बे-सबब है, पर कोई मरना न चाहे ये ग़ज़ब है !! यूँ बज़ाहिर तो तग़ाफ़ुल है बहुत सा इसकी तह में जो हक़ीक़त है अजब है, अहले दुनियां कुछ नई तो है नहीं, जो समां पहले था वो ही आज,अब है, चल रहे हैं हम मुसलसल ,किस लिए. इसके ऊपर सोचने का वक़्त कब है? ग़ैर मामूली नहीं ग़म ज़िन्दगी के, फिर भी इसका ज़िक्र ही हर्फ़ -ए-तरब है, क्यूँ झुका जाता है दिल शहनाइयों पर, ग़र फ़रेबे ज़ीस्त,खुशियों में नक़ब है, इसमें कुछ तहज़ीब के भी दायरे हैं, बे-अदब इंसान, दुनियां पर ज़रब है.... उर्मिला माधव 15.4.2016 =========================== ज़रब--- चोट नक़ब----सेंध तगाफ़ुल----उपेक्षा मुसलसल---लगातार ज़ीस्त--- ज़िन्दगी... तरब---ख़ुशी
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क्या समझूँ तुम्हें, एक डगमगाया हुआ वजूद? या एक क़ैदी ? बे-बुनियाद दायरों में महदूद, या बंधे हुए आसमान में उड़ने वाला पंछी, या बिना नाथ का बैल ? जिसकी नकेल, हरकारे के हाथों में, सिर्फ़ छेड़ने भर की देर है, अजब उन्माद झलकता है तुम्हारी आँखों में, तुम बहुत खुश दिखाई देते हो, शिकार होकर, और अभी इसका कोई इलाज भी नहीं, या कभी कोई इलाज नहीं, इसलिए मैं चली आई, तुमको कहीं खोकर, मेरी आँखों में, मेरी साँसों में, तुम नहीं के बराबर हो मुझे तुम्हारा इंतज़ार नहीं, और अब शायद कभी नहीं, उर्मिला माधव, 18.4.2016