यादें---- नज़्म ...
रात भर मेरे मुहल्ले में अजब सा शोर था,
यूँ लगा जैसे किसीकी चूड़ियों पर ज़ोर था,
हाथ डाले हाथ में आपस में बातें कर रहे थे,
एक झूठी रस्म को अंजाम देते डर रहे थे,
कल सुबह रंगीन चूड़ी लाई थी बाज़ार से,
और पहन कर हाथ को देखा बहुत ही प्यार से
बे-खबर थी,शाम तक क्या हादसा हो जाएगा,
हर किसीका ध्यान उसकी चूड़ियों पर जाएगा,
दर्द के रिश्ते कभी मिलते रहे जो प्यार से
रस्म के मद्दे नज़र सब होगये बेकार से,
मांग की सुर्खी हटा कर लोग समझाने लगे,
ज़िंदगी की तल्खियत,बातों से दिखलाने लगे,
देखने सुनने की उसको ताब थी बाक़ी कहाँ,
थी बहुत हलकान दोज़ख होगया कैसा जहां,
अब ज़माने के लिए बस एक मसला ख़ास था
चूड़ियाँ पत्थर से फोड़ी जायेंगी एहसास था......
उर्मिला माधव...
22.4.2014...

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