क्या समझूँ तुम्हें,
एक डगमगाया हुआ वजूद?
या एक क़ैदी ?
बे-बुनियाद दायरों में महदूद,
या बंधे हुए आसमान में
उड़ने वाला पंछी,
या बिना नाथ का बैल ?
जिसकी नकेल,
हरकारे के हाथों में,
सिर्फ़ छेड़ने भर की देर है,
अजब उन्माद झलकता है
तुम्हारी आँखों में,
तुम बहुत खुश दिखाई देते हो,
शिकार होकर,
और अभी इसका कोई
इलाज भी नहीं,
या कभी कोई इलाज नहीं,
इसलिए मैं चली आई,
तुमको कहीं खोकर,
मेरी आँखों में,
मेरी साँसों में,
तुम नहीं के बराबर हो
मुझे तुम्हारा इंतज़ार नहीं,
और अब शायद कभी नहीं,
उर्मिला माधव,
18.4.2016

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