फ़क़त रेशम सी गांठें थीं...ज़रा सी खोल ली जातीं, जो बातें दिल को चुभती थीं,जुबां से बोल लीं जातीं, अगरचे खौफ़ इतना था...कोई दिल पर न लेजाये, कहीं कहने से पहले एहतियातन...तोल ली जातीं, मुहब्बत को सलीके से....निभाना ही नहीं था तब, ज़रुरत क्या थी ऐसी मुश्किलें खुद मोल ली जातीं, फरेब-ओ-मख्र में,फंसना,फंसाना शौक था जिनका, दरीचे झाँकने को तब.........ज़मीनें गोल ली जातीं, किसीका क़त्ल करने को...हुनर की क्या ज़रुरत थी, कि बस हाथों की तलवारें....ज़हर में घोल ली जातीं... उर्मिला माधव... |
गरां दिल पे गुज़रा है गुज़रा ज़माना
गराँ दिल पे गुज़रा है,गुज़रा ज़माना, यूँ रेगे तपाँ में ........रहा आशियाना, हवाओं ने की उम्र भर ही ख़िलाफ़त, हुआ नेस्तोनाबूद ....अपना ठिकाना, हरे ज़ख़्म लेकर ..हुए दर-ब-दर के, शुरू कर दिया सबने..दामन बचाना, जो जज़्बात जम के हुए पत्थरों से, तो दफ़ना दिया हमने हंसना-हँसाना, जहां भर ने हमसे बहुत दिल्लगी की, कड़ा एक भी हमने फ़िकरा कहा ना, अजब कश्मकश से गुज़रते थे,फिर भी, न कुछ ज़िन्दगी से .......बनाया बहाना, नवाज़े गये .....सिर्फ़ तंज़-ओ-तबर से, बहुत सब्र अपना.......पड़ा आज़माना, बहुत चाहते हैं न सोचें हम इस पर, मगर दिल न भूले वो नज़रें चुराना, फ़क़त सच्ची ज़िद के,बहुत हम धनी थे, जो दिल ने न चाहा......न माना,न माना.... उर्मिला माधव, 11.7.2016
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