हम निरे अहसास से जूझा किये दिन रात बस,
आपने जारी रखे,....अपने मुक़म्मल घात बस,

अब्र भी कुछ आदतन बस बर्क बरसाया किया,
जिस्म-ओ-जां तनहा रहे कुछ था भी तो हालात बस,

हम कभी समझे नहीं क्यूँ कर हसद था आपको,
तज़किरा करते रहे क्यूँ बात और बेबात बस

आप भी जब दोस्ती के नाम पर धब्बा रहे ,
झूठ सच के बलबले थे गम की थी इफरात बस

कम जगह पड़ने लगी तो होगया हलकान दिल,
दम-ब-दम बढ़ती रही सैलाब की तादात बस,

इन बलाओं से .....कभी बचना हमें आया नहीं,
झोंकते ही रह गए हम अपने सब जज़्बात बस,
उर्मिला माधव..

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