राह जो चलनी है इसमें खूबियाँ कोई नहीं,
रूह-ए-खुद को छोड़ के वक़्त-ए-गिरां कोई नहीं,

दह्र है जलता हुआ और पथ्थरों के आदमी
चिलचिलाती धूप है ऑ आशियाँ कोई नहीं,

और कितना आज़माना,जो हुआ वो खूब है,
तुम वही हो,हम वही राज़-ए-निहां कोई नहीं,

है नया कुछ भी नहीं क्यूं इस क़दर हैरां हुए,
साथ चलने को तुम्हारे,अय मियाँ कोई नहीं,

सामने मक़्तल हुआ लो फ़िक़्र से खारिज़ हुए
बस यही रस्ता है...जिसके दरमियाँ कोई नहीं.....
उर्मिला माधव,
4.4.2016

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