ये सभी कहते हैं,दुनियां बे-सबब है,
पर कोई मरना न चाहे ये ग़ज़ब है !! यूँ बज़ाहिर तो तग़ाफ़ुल है बहुत सा इसकी तह में जो हक़ीक़त है अजब है, अहले दुनियां कुछ नई तो है नहीं, जो समां पहले था वो ही आज,अब है, चल रहे हैं हम मुसलसल ,किस लिए. इसके ऊपर सोचने का वक़्त कब है? ग़ैर मामूली नहीं ग़म ज़िन्दगी के, फिर भी इसका ज़िक्र ही हर्फ़ -ए-तरब है, क्यूँ झुका जाता है दिल शहनाइयों पर, ग़र फ़रेबे ज़ीस्त,खुशियों में नक़ब है, इसमें कुछ तहज़ीब के भी दायरे हैं, बे-अदब इंसान, दुनियां पर ज़रब है.... उर्मिला माधव 15.4.2016 =========================== ज़रब--- चोट नक़ब----सेंध तगाफ़ुल----उपेक्षा मुसलसल---लगातार ज़ीस्त--- ज़िन्दगी... तरब---ख़ुशी |
दास्तां कह रही हैं
हवाएं अजब दास्तां कह रही हैं, कहाँ से चली हैं, कहाँ बह रही हैं
Comments
Post a Comment