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Showing posts from October, 2025

बिछड़ जाएं

इससे पहले कि आप लड़ जाएं, क्या ही बेहतर हो हम बिछड़ जाएं, रात भर ग़मज़दा हों सोएं नहीं इन झमेलों में हम न पड़ जाएं, इक ज़बानी जमा ऑ ख़र्चे में, आपके तीर दिल में गड़ जाएं, उर्मिला माधव 

झांइयां

आँख के नीचे की काली झाइयां, और सारी उम्र की तन्हाईयाँ   घेरती हैं अब सवालों से मुझे, आज गुज़रे वक़्त की परछाईयाँ, यूँ भी कहते ही नहीं बनता है कुछ,   जब ये मुझमें खोजें हैं रानाईयाँ, जो भी गुज़रा हो मगर इतना रहा, ज़िन्दगी ने नाप लीं गहराइयाँ , पाँव तो हर दम ज़मीं पर ही रहे  चश्म-ए-नम से देख लीं ऊँचाइयाँ, दिल मेरा अनहद कहीं सुनता रहा  दूर कुछ बजती रहीं शहनाइयाँ ---- #उर्मिलामाधव... 31.10.2015

फिल्बदी

फिल बदीह में अभी-अभी कही गई ग़ज़ल--- :: है ये नेमत ज़िन्दगी तो आज़माना चाहिए, जो भी कुछ मिल जाए उसपे,मुस्कुराना चाहिए, :: hai niyamat zidagi to aazmaanaa chahiye, jo bhi kuchh mil jaaye uspe,muskurana chahiye... :: बेखुदी में मुब्तिला होकर नहीं रहना यहाँ, हंसके रोना,रोके हँसना,कुछ तो आना चाहिए, :: bekhudi main mubtila hokar nahin rahna yahan, hanske rona,roke hansna,kuchh to aanaa chahiye, :: खुशनसीबी से अगर इक दोस्त भी मिल जाए तो, दोनों हाथों से उसे ........बढ़कर निभाना चाहिए, :: khush nasiibi se agar ik dost bhi mil jaaye to, donon hathon se use badh kar nibhaana chahiye, :: कौन जाना है इसे ये ज़िन्दगी क्या खेल है, ये समझने के लिए तो एक ज़माना चाहिए, :: kaun samjha hai ise ye zindagi kya khel hai, ye samajhne ke liye to ek zamaana chahiye, :: जाने कितने मिट गए मुफलिस,तवंगर,दह्र में, हर किसीको अपने हक का आब-ओ-दाना चाहिए. :: jaane kitne mit gaye,muflis,tavangar dahr main, har kisiko,apne haq ka,aab-o-daanaa chahiye, #उर्मिलामाधव-- 31.10.2015

दीवाली

न जाने किस जगह जा कर छुपी है अब वो दीवाली, चरागाँ जब दर-ओ-दीवार होते थे हर इक घर के,  मुहब्बत से भरे होते थे रिश्ते .....जब वो पीहर के, ज़रा सी बात पर खुशियां,नज़र आती थीं चेहरे पर, कभी अम्मा से छुप के पंख भी चुनते थे तीतर के, मगर मज़हब की कालिख़ से हर इक दीवार है काली, न जाने किस जगह जा कर छुपी है अब वो दीवाली, उर्मिला माधव... 31.10.2016

नाज़िम

अय मिरे नाज़िम मेरा तू क्या तआरुफ़ दे रहा है, पर समझ ले जो भी सच है,होगा ही होके रहा है, उर्मिला माधव 

नज़र को नज़र से मिला कर के देख

नज़र को नज़र से मिला करके देख, कभी ख़ुद को यां तक भी ला करके देख कभी मेरे दिल को हिला करके देख, बनाया मुझे जिसने तबियत से ख़ूबाँ, मेरे कूज़ागर से गिला कर के देख, सबाब-ए-मुहब्बत तवारीख होगी, किसी मर्ग-ए-दिल को जिला कर के देख, तुझे राहतों की भी नेमत मिलेगी  कोई चाक दामन सिला करके देख, तेरी ज़िन्दगी को ही तस्कीन होगी, कभी हक किसीका दिला करके देख.... उर्मिला माधव... 31.10.2016

मफ़लूक समझ कर ही उसने छोड़ दिया

एक मतला तीन शेर.. ---------------------  मुझको मफ्लूक समझ कर ही उसने छोड़ दिया, ऐसा बे-फ़िक्र हुआ दिल को लिया.....तोड़ दिया, चाँद-ओ-अख्तर भी हुए देख के......हैरत अगेज़, क्या है ये शख्स जो पत्थर पे सर को फोड़ दिया!! हाथ को अपने कलेजे पे फिरा के ही सांस लेते थे, उसने कुछ ऐसा किया दिल ही...बस मरोड़ दिया, कुछ भी पूछा ही नहीं तुम पे क्या गुजरी .तालिब? इतनी क़ुव्वत ही कहाँ थी कि बस झिंझोड़ दिया?? उर्मिला माधव... २८.१०.२०१३ मफ्लूक-----दरिद्र  क़ुव्वत----- शक्ति.. अख्तर------तारे  हैरत-अंगेज़ ---आश्चर्य चकित..

कभी कुछ सिहर के

कभी कुछ बिखर के,कभी आह भरके  संभाला है ये दिल मुसलसल सिहर के, किसे क्या बताते अजब मुश्किलें थीं, ख़तरनाक दुनिया में गुजरी है डर के, न जाने वो क्या था समझ में न आया, के ये जिंदगानी मिली हमको मर के, मुक़द्दर था यकता ज़माने में अपना, हरे ज़ख्म लेकर फिरे दर-ब-दर के, मेरे आँसुओं से जो दामन था भीगा - चला भी गया दे के असबाब घर के, उर्मिला माधव... 2.10 2014...

ज़ाहिर करूंगी मैं

जो अब तक कर रही हूँ मैं,वही फिर-फिर करुँगी मैं, अगर कोई ठेस पहुंचेगी,ग़ज़ल हाज़िर करुँगी मैं, कोई जज़्बात अपने दिल में रखके रो नहीं सकती, कोई आज़ार हो, अल्फ़ाज़ से ज़ाहिर करुँगी मैं, अयां होती रही हैं कुल जहाँ की साज़िशें मुझ पर, भला ऐसे ज़माने का भी क्या आख़िर करुँगी मैं, दिमाग़-ओ-दिल की ताबानी,कभी पिन्हाँ नहीं होती, फ़क़त किरदार की दम पर,जहाँ ताहिर करुँगी मैं, अगर उन्वान इज़्ज़त है तो फिर क़ुर्बान है सब कुछ, ख़लिश की हर हदों तक ज़िंदग़ी माहिर करुँगी मैं... #उर्मिलामाधव.. 24.10.2015

दोगली दुनिया

ये दुनियां,दोगली दुनियां, ये दुनियां खोखली दुनियां, झुका ले सर अगर दम है, ये दुनियां,ओखली दुनियां... न पहचाना मगर सर पर, ये दुनियां ठोक ली दुनियां, मुसव्विर ने भी पछता कर, ये दुनियां भोग ली दुनियां, मगर कुछ ख़ास लोगों ने, ये दुनियां सोख ली दुनियां, ब-मुश्किल अपने हाथों पर ये दुनियां रोक ली दुनियां, #उर्मिलामाधव 24.10.2015

परवाह बोलो

मैं किसीकी क्यूँ करूँ परवाह, बोलो, एक तरफ़ा कब निभी है चाह, बोलो, जानिब-ए-मंज़िल मुझे जाना ही होगा, ज़िन्दगी भर क्यूँ तकूँ अब राह, बोलो, ज़िन्दगी को दर्द-ए-गम का वास्ता दूँ ? क्या वो आइन्दा न देगी आह, बोलो, जो मिले सौगात दे बस आंसुओं की, ये कहो कब तक करूं मैं वाह, बोलो, ज़िन्दगी मेरी में रख्खूँ या न रख्खूँ इसके मिटने पै भी लूँ इस्लाह बोलो? उर्मिला माधव... 1.10.2017

हुए हज़ारों टुकड़े दिल के

एक मतला दो शेर----- हुए हज़ारों टुकड़े दिल के,और क़हर से क्या होता है?? हम मानिंन्द हुए मुर्दे के,और ज़हर से क्या होता है?? जिसकी हो जागीर हमेशा रहे उसी की मरते दम तक, कोई इस्तक़बाल कहे बस और शहर से क्या होता है??  दीवारों से बने हुए हैं,ताजमहल और मंदिर मस्जिद, आमद-रफ्त बशर की क़ायम और दहर से क्या होता है ?? उर्मिला माधव... 24.2.2014..

वा करूं मैं

आसमां पै रास्ता अब वा करूँ मैं ? या नई दुनियां कोई पैदा करूँ मैं ? जिसको देखो दुश्मनी के रंग में है, ज़िन्दगी तू ही बता दे क्या करूँ मैं ? जब ख़ुदा भी हाथ में खंजर लिए हो, कौनसे दर पै भला सजदा करूँ मैं ? हर शिकायत आपको ज़ाहिर तो की है, और अब किस ढंग से शिकवा करूँ मैं? जल रही हैं,आग की लपटें....धकाधक, किस तरह बचके कहाँ निकला करूँ मैं, अश्क बे-गैरत है,फिर भी ख्वाहिशें हैं, साथ इनके उम्र भर.......रोया करूं मैं, दिल्लगी भी कम नहीं की है जहां ने, था यही लाज़िम फक़त देखा करूं मैं, तीरगी तक़दीर में अव्वल लिखी है, चांदनी रातों को क्यूँ रुसवा करूं मैं.... उर्मिला माधव 

पापा

ये मेरे भीतर की गहराई और गहरी होगई जिजीविषा ठहर गई हो जैसे कुछ सोचती नहीं सोचना चाहती भी नहीं इतिहास डसने लगता है स्कूल की पेरेंट्स मीटिंग हमेशा सताया जिसने मुझे पापा...... ये लफ़्ज़ कभी कहा ही नहीं पिता के साथ लिपटते हुए मेरे हमजोली मेरी सूनी आँखें शून्य में और शून्य हो गईं #उर्मिलामाधव 16.10.2015

कहां होते हैं ऐसे दोस्त

दोस्त कहाँ होते हैं मालूम नहीं, दुःख को दुःख की तरह समझने वाले कहाँ होते हैं जो प्यार के अहसास को निर्भरता का नाम नहीं देते  कहाँ होते हैं ऐसे लोग मालूम नहीं बरसों पहले किसीके मुंह से ये लफ़्ज़ पहली बार सुना था ब्रीदिंग स्पेस... जिससे कहा गया  उसने भोलेपन में समझा ही नहीं मेरे लिए भी नया था लेकिन आज मैं इसके मानी ख़ूब जानती हूँ इसे दामन छुड़ाना कहते हैं अंग्रेजी है ये हमारी समझ से दूर ऐसे घुमावदार लफ़्ज़ अच्छे नहीं सच और साफ कह देना  ज़ियादा ठीक था मुझे अगर ये लफ़्ज़ जब भी सुनना ही पड़ जायेगा प्रीफर करुँगी भूलना उम्र भर का ऐसे अल्फ़ाज़ रिश्तों के मज़ाक उड़ाते से लगते हैं यानि घुटन कोई क्यों बर्दाश्त करे बेहतर हो.... चलो एक बार फिर से अजनबी बन जांय क्योंकि मुझे ख़ामोशी  फूलों जैसी नहीं लगती चिकनी बातें करना मुझे नहीं आता,कभी आया भी नहीं और आना भी नहीं है अच्छा है बहुत ये एकला चालो रे... #उर्मिलामाधव 16.10.2015

भर गया होता

एक मतला दो शेर----- अगर ये वक़्त कभी हम से डर गया होता, ये समझो ज़ोर-ओ-ज़बर ग़म भी मर गया होता, सदा-ए-रंज-ओ अलम, हमसे डर गई होती, बहार-ओ-गुल का चमन रक्स कर गया होता, अगर वफ़ा की नज़र,हमसे मिल गई होती, पुराना ज़ख्म-ए-जिगर कबका भर गया होता, #उर्मिलामाधव

जब किसी क़ब्र की कोई ईंट

जब किसी क़ब्र से इक ईंट उखड जाती है, घर की दीवार से कुछ राख़ सी झड़ जाती है, दश्त-ए-खुर्शीद से उतरी सी कोई बेचैनी , ग़म ज़दा करके मेरे पीछे ही पड़ जाती है,  ऐसा लगता है हर इक ज़ात से हूँ वाबस्ता, वरना क्या चीज़ है जो रूह में गड़ जाती है, उर्मिला माधव

उसने चाहा था वो लिखा जाए

उसने चाहा था वो लिखा जाये, इससे बेहतर है ....मर्सिया गाये दिल मगर इन्तिख़ाब करता है अब किसीसे न कुछ कहा जाये झूठ से पुर असर तबस्सुम क्या, इब्न-ए-आदम पै हर गिला जाए, किसकी अब बानगी तलाशे दिल, ख़ाक़ दरिया में जब बहा आये, अब ये तबियत कहीं नहीं लगती, इस तरह कब तलक चला जाए, अपनी मुठ्ठी में ख़ाक़ रखते हैं, ज़िन्दगी तुझसे क्या मिला जाए.. #उर्मिलामाधव 11.10.2015

पीड़ित हृदय को

क्यों अकारण ही करें पीड़ित हृदय को, स्वयम ही स्वीकार लें बाधित समय को, हर नदी की संधि है,सागर के तट पर, ये हुआ, स्वीकारना निश्चित विलय को, जब कभी सागर ने अपने बांध तोड़े, कौन कर पाया है,मर्यादित प्रलय को ? प्रेम की अभिव्यक्ति हो निर्मल हृदय से, तब कहाँ सीमाएं,अनुमोदित प्रणय को ? हम स्वयम प्रहरी हैं अपनी भावना के, और नहीं तोड़ेंगे, अनुबंधित वलय को, उर्मिला माधव, 8.10.2017

खूबियां कोई नहीं

राह जो चलनी है इसमें ख़ूबियाँ कोई नहीं, रूह-ए-खुद को छोड़ के वक़्त-ए-गिरां कोई नहीं, दह्र है जलता हुआ और पथ्थरों के आदमी चिलचिलाती धूप है ऑ आशियाँ कोई नहीं, और कितना आज़माना,जो हुआ वो ख़ूब है, तुम वही हो,हम वही राज़-ए-निहां कोई नहीं, है नया कुछ भी नहीं क्यूं इस क़दर हैरां हुए, साथ चलने को तुम्हारे,अय मियाँ कोई नहीं, सामने मक़्तल हुआ लो फ़िक़्र से ख़ारिज़ हुए  इक यही रस्ता है...जिसके दरमियाँ कोई नहीं..... उर्मिला माधव,

राह जो चलनी है

राह जो चलनी है इसमें खूबियाँ कोई नहीं, रूह-ए-खुद को छोड़ के वक़्त-ए-गिरां कोई नहीं, दह्र है जलता हुआ और पथ्थरों के आदमी चिलचिलाती धूप है ऑ आशियाँ कोई नहीं, और कितना आज़माना,जो हुआ वो खूब है, तुम वही हो,हम वही राज़-ए-निहां कोई नहीं, है नया कुछ भी नहीं क्यूं इस क़दर हैरां हुए, साथ चलने को तुम्हारे,अय मियाँ कोई नहीं, सामने मक़्तल हुआ लो फ़िक़्र से खारिज़ हुए  बस यही रस्ता है...जिसके दरमियाँ कोई नहीं..... उर्मिला माधव, 7.10.2014

महापार ए दरअख्शान

माहपार-ए-दरख्शां बहुत ख़ूब है,  प्यार मेरा मगर तुमसे मंसूब है, जानना है ज़रूरी सुनो दीदा वर,  बा-वफाई मुहब्बत का उस्लूब है  आफरीं-आफरीं मेरा दीवाना पन, लोग कहते हैं वो देखो मज्जूब है, आशिक़ी का सिला मरहबा,मरहबा, कैसे झुठलाएंगे गर ये मक्तूब है, तार दामन के देखेंगे बिखरे अगर, लोग कहते फिरेंगे कि मत्लूब है, आशिक़ी को है दरक़ार ज़िंदादिली,  जीतेजी मर गया,वो जो मग्लूब है,  उर्मिला माधव... माहपार-ए-दरख्शां---उगता हुआ चाँद , दीदावर------देखने वाले, उस्लूब---आचरण  आफरीं--- वाह-वाह .. मज्जूब---देखने में पागल लेकिन परमहंस  मक्तूब--- लिखा हुआ, मत्लूब---प्रेमी, मग्लूब---ओंधा गिरा हुआ...

अदब अब सभी के

अदब अब सभी के दफ़ा हो गए हैं, बुज़ुर्गाने आला ख़फा हो गए है समेटे नहीं जा सके दिल के टुकड़े, ये हिस्से भी कितनी दफ़ा हो गए हैं, सिखाई मुहब्बत-ऑ-तहज़ीब जिनको, जवां क्या हुए,........बे-वफ़ा हो गए हैं, मुहब्बत के मानी बचे ही कहाँ कुछ, फ़क़त अब ज़ियाँ और नफ़ा हो गए हैं....  वो सर को झुकाना ऑ तस्लीम कहना, किताबों का बस फ़लसफ़ा होगये हैं, #उर्मिलामाधव... 5.10.2015

फ़िक्र करने से कुछ नहीं होगा

फ़िक़्र करने से कुछ नहीं होगा, आह भरने से कुछ नहीं होगा, दिल में इक इन्क़लाब है तो है, मुफ़्त डरने से कुछ नहीं होगा, राह भी इन्तिख़ाब करके चल, बात करने से कुछ नहीं होगा, जब सहर ख़ुशनुमा मुक़ाबिल है, यूँ सिहरने से कुछ नहीं होगा, मुस्कुरा, ये भी मन दुरुस्ती है, जीने मरने से कुछ नहीं होगा, हादिसे आदतों में शामिल कर, यूँ बिखरने से कुछ नहीं होगा.... उर्मिला माधव...

प्रेम की अभिव्यक्तियां

प्रेम की अभिव्यक्तियाँ स्पष्ट दर्शातीं हैं सब, भावनाएं संकुचित हो दर्प कर पाती हैं कब? अनवरत सम्मुख उजागर हों जहां अविरल प्रलाप, रात्रि के अंतिम प्रणय का मर्म बतलाती हैं तब.. सूर्य की सब रश्मियों ने जब किया विस्मृत समय तब किसीकी व्यंजनाएँ धैर्य धर पाती हैं कब? कोई स्थितप्रज्ञ होकर भित्तियों सम होगया, उसको वेदों की ऋचाएं ढूंढ कर लाती हैं तब... उर्मिला माधव

रंग देखे हैं

हमने दुनिया के रंग देखे हैं, चलते फिरते मलंग देखे हैं. हमने उल्फ़त से चूर हाथों में, कैसे उठते हैं संग, देखे हैं,

इबादत से अगर चे

इबादत से अगरचे हम बहुत मंसूब होजाएं, तो लाज़िम है ज़माने की नज़र में खूब हो जाएं, किसी दिल में क़दम रखना भी कार-ए-पुख्ता कारा है, ज़रा नज़र-ए-इनायत हो कि बस महबूब हो जाएं, हज़ारों जान से कुरबान होने पर भी क्या हासिल, मज़ा तो तब है जबकि दर्द के उस्लूब होजाएं, हम अब भी आज भी अपने जिगर में ताब रखते हैं, अगर जो ज़िद पे आजाएं तो बस मतलूब हो जाएं... उर्मिला माधव 11.12.2013.. उस्लूब--- आचरण  मतलूब---प्रेमी