पापा
ये मेरे भीतर की गहराई
और गहरी होगई
जिजीविषा ठहर गई हो जैसे
कुछ सोचती नहीं
सोचना चाहती भी नहीं
इतिहास डसने लगता है
स्कूल की पेरेंट्स मीटिंग
हमेशा सताया जिसने मुझे
पापा......
ये लफ़्ज़ कभी कहा ही नहीं
पिता के साथ लिपटते हुए
मेरे हमजोली
मेरी सूनी आँखें शून्य में
और शून्य हो गईं
#उर्मिलामाधव
16.10.2015
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