मफ़लूक समझ कर ही उसने छोड़ दिया
एक मतला तीन शेर..
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मुझको मफ्लूक समझ कर ही उसने छोड़ दिया,
ऐसा बे-फ़िक्र हुआ दिल को लिया.....तोड़ दिया,
चाँद-ओ-अख्तर भी हुए देख के......हैरत अगेज़,
क्या है ये शख्स जो पत्थर पे सर को फोड़ दिया!!
हाथ को अपने कलेजे पे फिरा के ही सांस लेते थे,
उसने कुछ ऐसा किया दिल ही...बस मरोड़ दिया,
कुछ भी पूछा ही नहीं तुम पे क्या गुजरी .तालिब?
इतनी क़ुव्वत ही कहाँ थी कि बस झिंझोड़ दिया??
उर्मिला माधव...
२८.१०.२०१३
मफ्लूक-----दरिद्र
क़ुव्वत----- शक्ति..
अख्तर------तारे
हैरत-अंगेज़ ---आश्चर्य चकित..
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