महापार ए दरअख्शान

माहपार-ए-दरख्शां बहुत ख़ूब है, 
प्यार मेरा मगर तुमसे मंसूब है,

जानना है ज़रूरी सुनो दीदा वर, 
बा-वफाई मुहब्बत का उस्लूब है 

आफरीं-आफरीं मेरा दीवाना पन,
लोग कहते हैं वो देखो मज्जूब है,

आशिक़ी का सिला मरहबा,मरहबा,
कैसे झुठलाएंगे गर ये मक्तूब है,

तार दामन के देखेंगे बिखरे अगर,
लोग कहते फिरेंगे कि मत्लूब है,

आशिक़ी को है दरक़ार ज़िंदादिली, 
जीतेजी मर गया,वो जो मग्लूब है, 
उर्मिला माधव...

माहपार-ए-दरख्शां---उगता हुआ चाँद ,
दीदावर------देखने वाले,
उस्लूब---आचरण 
आफरीं--- वाह-वाह ..
मज्जूब---देखने में पागल लेकिन परमहंस 
मक्तूब--- लिखा हुआ,
मत्लूब---प्रेमी,
मग्लूब---ओंधा गिरा हुआ...

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