कभी कुछ सिहर के
कभी कुछ बिखर के,कभी आह भरके
संभाला है ये दिल मुसलसल सिहर के,
किसे क्या बताते अजब मुश्किलें थीं,
ख़तरनाक दुनिया में गुजरी है डर के,
न जाने वो क्या था समझ में न आया,
के ये जिंदगानी मिली हमको मर के,
मुक़द्दर था यकता ज़माने में अपना,
हरे ज़ख्म लेकर फिरे दर-ब-दर के,
मेरे आँसुओं से जो दामन था भीगा -
चला भी गया दे के असबाब घर के,
उर्मिला माधव...
2.10 2014...
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