परवाह बोलो
मैं किसीकी क्यूँ करूँ परवाह, बोलो,
एक तरफ़ा कब निभी है चाह, बोलो,
जानिब-ए-मंज़िल मुझे जाना ही होगा,
ज़िन्दगी भर क्यूँ तकूँ अब राह, बोलो,
ज़िन्दगी को दर्द-ए-गम का वास्ता दूँ ?
क्या वो आइन्दा न देगी आह, बोलो,
जो मिले सौगात दे बस आंसुओं की,
ये कहो कब तक करूं मैं वाह, बोलो,
ज़िन्दगी मेरी में रख्खूँ या न रख्खूँ
इसके मिटने पै भी लूँ इस्लाह बोलो?
उर्मिला माधव...
1.10.2017
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