वा करूं मैं
आसमां पै रास्ता अब वा करूँ मैं ?
या नई दुनियां कोई पैदा करूँ मैं ?
जिसको देखो दुश्मनी के रंग में है,
ज़िन्दगी तू ही बता दे क्या करूँ मैं ?
जब ख़ुदा भी हाथ में खंजर लिए हो,
कौनसे दर पै भला सजदा करूँ मैं ?
हर शिकायत आपको ज़ाहिर तो की है,
और अब किस ढंग से शिकवा करूँ मैं?
जल रही हैं,आग की लपटें....धकाधक,
किस तरह बचके कहाँ निकला करूँ मैं,
अश्क बे-गैरत है,फिर भी ख्वाहिशें हैं,
साथ इनके उम्र भर.......रोया करूं मैं,
दिल्लगी भी कम नहीं की है जहां ने,
था यही लाज़िम फक़त देखा करूं मैं,
तीरगी तक़दीर में अव्वल लिखी है,
चांदनी रातों को क्यूँ रुसवा करूं मैं....
उर्मिला माधव
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