इबादत से अगर चे
इबादत से अगरचे हम बहुत मंसूब होजाएं,
तो लाज़िम है ज़माने की नज़र में खूब हो जाएं,
किसी दिल में क़दम रखना भी कार-ए-पुख्ता कारा है,
ज़रा नज़र-ए-इनायत हो कि बस महबूब हो जाएं,
हज़ारों जान से कुरबान होने पर भी क्या हासिल,
मज़ा तो तब है जबकि दर्द के उस्लूब होजाएं,
हम अब भी आज भी अपने जिगर में ताब रखते हैं,
अगर जो ज़िद पे आजाएं तो बस मतलूब हो जाएं...
उर्मिला माधव
11.12.2013..
उस्लूब--- आचरण
मतलूब---प्रेमी
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