कम से कम
जिस्म, जां दुश्वारियों से थक रहे हैं दम-ब-दम, सांस लेने की भी मोहलत कब मिली अहले करम ? तीर -ओ-खंजर से भी क्या डरना बता ऐ ज़िंदगी, बस यही असबाब तो अपने रहे हैं हम क़दम, हौसले कब पस्त हैं,सेहरा की जद को तोड़ कर, बस हवा दरकार थी,रेग-ए-तपां में कम से कम, लोग कहते हैं सुख़नवर,लीक पर चलते नहीं, सोचते हैं इसकी इज़्ज़त बा अदब रख्खेंगे हम, अपने ही अंदाज़ में जीना गवारा है हमें, हो रहे तूफान बरपा या के हो रंज-ओ-अलम... जब जहाँ तबियत हुई सजदा किया हमने वहीँ, कौन इतना फ़र्क़ करता, घर है या दैर-ओ-हरम, उर्मिला माधव, 30.4.2016