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Showing posts from April, 2025

कम से कम

जिस्म, जां दुश्वारियों से थक रहे हैं दम-ब-दम, सांस लेने की भी मोहलत कब मिली अहले करम ? तीर -ओ-खंजर से भी क्या डरना बता ऐ ज़िंदगी, बस यही असबाब तो अपने रहे हैं हम क़दम, हौसले कब पस्त हैं,सेहरा की जद को तोड़ कर, बस हवा दरकार थी,रेग-ए-तपां में कम से कम, लोग कहते हैं सुख़नवर,लीक पर चलते नहीं, सोचते हैं इसकी इज़्ज़त बा अदब रख्खेंगे हम, अपने ही अंदाज़ में जीना गवारा है हमें, हो रहे तूफान बरपा या के हो रंज-ओ-अलम... जब जहाँ तबियत हुई सजदा किया हमने वहीँ, कौन इतना फ़र्क़ करता, घर है या दैर-ओ-हरम, उर्मिला माधव, 30.4.2016

रूठ जाते हैं

ऐसा करते हैं,रूठ जाते हैं, ज़िन्दगी भर को छूट जाते हैं... कब तलक आपको पुकारें हम, इतना थकते हैं टूट जाते हैं.. दिल को थामे हैं दोनों हाथों से, आबले फिर भी फूट जाते हैं.. दिल पे पहले ही से ग़रीबी है, लोग ..रह रह के लूट जाते हैं, दिल ने हमको रुलाके तोड़ा है, इसको हाथों से कूट जाते हैं, उर्मिला माधव... 30.4.2017

नमी न रही

ख़ुश्क आंखों में जब नमी न रही, ज़िन्दगी फ़िर ये ज़िन्दगी न रही, जब बड़े हादसों की ज़द में रहे, ज़ब्त की फ़िर कहीं कमी न रही, हमको तनहाई ने संभाला बहुत, तीरगी तुझ से बरहमी न रही, खिड़कियां धुल गईं जो बारिश में, गर्द फ़िर देर तक जमी न रही... उर्मिला माधव,

इदारा निकला

कुछ अशआर जो बुलंदी की हवाओं पे उड़े शाम ओ सहर, उनकी तह में भी कोई ख़ास इदारा निकला, हम जो मग़रूर रहे, ख़ुद को जुदा कर लेंगे, तुझसे ऐ दिल न मगर काम हमारा निकला, हमने अहबाब से जब ख़ूब गुज़ारिश करली, इब्ने दुश्मन ही कई बार सहारा निकला, हम खड़े होके भंवर में ही जलाते थे चराग़, झुक के देखा तो बड़ी पास कनारा निकला, हमको कमरे में बहुत धुंध नजऱ आने लगी, डर के देखा तो कोई आम शरारा निकला, उर्मिला माधव

कुछ पता तो करो

किसने भेजा है ये पयाम कुछ पता तो करो, क्या है इलज़ाम मेरे नाम कुछ पता तो करो, शह्र में किस तरह का शोर आज बरपा है' सबका है सब्र क्यूं तमाम कुछ पता तो करो... चार सम्तों में इक नफ़स को जगह है के नहीं, और क्या क्या है इंतज़ाम कुछ पता तो करो. ख़ून के रंग में अब रंगी सी लगे रंग ए हिना, किस तरह का है इंतक़ाम कुछ पता तो करो. क्यों हवाओं में रंग शामिल है अब सियासत का, और किस किस का है ये काम कुछ पता तो करो #उर्मिलामाधव 29.4.2015..
एक ग़म कुछ ऐसे चस्पां हो गया, दिल का कोना कोना वीरां हो गया, सांस थमने पर भी हम ऐसे चले, जिस्म का हर ज़ख़्म हैरां हो गया, कोई भी मंजिल नज़र में थी ही कब, ग़म ही था सो फिर मेहरबां हो गया,
एक ग़म कुछ ऐसे चस्पां हो गया, दिल का कोना कोना वीरां हो गया, सांस रुकती थी कि हम ऐसे चले, जिस्म का हर ज़ख़्म हैरां हो गया, कोई भी मंजिल नज़र में थी ही कब, ग़म ही था सो करम फ़र्मां हो गया,

तिरछी अदा से

तिरछी अदा से बात का कहना सवाब है, कुछ भी सह्ल नहीं है, ज़माना ख़राब है, बच बच के चल रहे हो, कहाँ बच सके मगर, बेआबरू खड़े हो, यही इक जवाब है, जिस राह पर चले हैं तहम्मुल से आज तक, एहसास हो गया है यहीं इज़्तिराब है, जब तुन्द आंधियों से कभी हम नहीं डरे, सरमाया ज़िन्दगी का मगर, आब आब है, उनको गुमान तिफ़्ल हमें जानते हैं वो, दिल में हसद है मुंह पे मगर जी जनाब है, हम मुस्तहक थे फिर भी कभी कुछ नहीं कहा, अपना वजूद उनको फ़क़त इक हबाब है, उर्मिला माधव

छोड़कर

अब ज़मीं से आसमानों तक के रस्ते छोड़कर, हम चले आये हैं तुमसे सब मरासिम तोड़कर, चाह से और आह तक भी कर दिए हमने दफ़न,  चल नहीं सकते हैं हरगिज़ हम जहाँ की होड़ कर, तुमने बस इतना कहा था,छुपके ही मिलना कभी, तुमको देखा ही नहीं फिर आँख अपनी मोड़ कर  हम कलेजा साफ़ रख कर ही अबस तुमसे मिले, तुम हमेशा खुश रहे हो इसकी,उससे जोड़ कर ..... वक़्त ही तो है कभी ....उल्टा अगर ये हो गया, बैठ कर रोया करोगे,सर ख़ुद अपना फोड़ कर... #उर्मिलामाधव ... 22.4.2015

एकएक मतला दो शेर-----

एक मतला दो शेर-----  हुए हज़ारों टुकड़े दिल के,और क़ह्र से क्या होता है?? हम मानिंन्द हुए मुर्दे के,और ज़ह्र से क्या होता है?? जिसकी हो जागीर हमेशा रहे उसी की मरते दम तक, कोई इस्तक़बाल कहे बस और शह्र से क्या होता है?? दीवारों से बने हुए हैं,ताजमहल और मंदिर मस्जिद, आमद-रफ्त बशर की क़ायम और दह्र से क्या होता है ?? उर्मिला माधव... 24.2.2014..

रु ब रु

ख़ूब रु था रु-ब=रु, जाने क्या थी गुफ़्तगू, क्यूँ अजब सा है असर, मिट गई हर आरज़ू, ख़ाब हो या हो ख़याल, अब न कोई जुस्तजू , आँख ने चाहा जिसे, हर घड़ी ऑ कू-ब-कू, ज़िद हमारी सुन ज़रा , माहवश ऐ माहरू, तेरी दुनियां तू समझ, मेरी दुनियां,अल्ला हू, जिस्म-जां तनहा सही, और ग़म भी चार सू , मैं रहूँ बस मैं ही में, तू रहे बस तू ही तू ...... #उर्मिलामाधव ... 20.4 .2015

याद आता है

कड़े फिकरे कोई कह कर, चला जाता था जो अक्सर, तग़ाफ़ुल उसकी नज़रों में, कभी देखा था जो मैंने, वो मुझको याद आता है।। ज़मीं जब ज़ख़्म धोती थी, फ़लक़ रह-रह के रोता था , कहीं तन्हाई में जाकर, कोई दामन भिगोता था वो मुझको याद आता है।। कहीं पर माँ बिछुड़ जाना, न ये दुनियां समझ पाना, किसी बच्चे की आँखें थीं कहीं जब मुन्तज़िर माँ की, वो मुझको याद आता है।। कोई मय्यत के आगे बैठकर, रोया नहीं हरगिज़, मगर आरिज़ की सुर्खी, कह रही थी,हाल अश्कों का, वो मुझको याद आता है।। कोई मंज़िल न थी फिर भी, मुसलसल,चल रही थी मैं, निशां क़दमों के दुनियां को, नहीं दिखते थे,जाने क्यूँ, वो मुझको याद आता है।। उर्मिला माधव, 20.4.2016

डसती रही

सुकून-ए-दिल के लिए ज़िन्दगी तरसती रही, मगर ये सांप सी दुनियां के सिर्फ़ डसती रही, हमारी रूह ने देखा तो ख़्वाब शीरीं था, अजब अज़ाब रहा, ज़िन्दगी झुलसती रही, बड़े ही शौक़ से पहुंचे थे, बर्फ़ के घर में, मगर लगा के कहीं, आग सी बरसती रही, किसी भी शै को अगर दिल ने अपना मान लिया, उलट-पलट के वही, तंज़-ओ-तीर कसती रही, मुख़ालफ़त को बहुत दूर से सलाम किया बहुत कमाल वही साथ-साथ बसती रही, उर्मिला माधव, 20.4.2017

बात ऐसी

बात ऐसी मैं तुम्हें बतला रही हूँ, ख़ास मंज़िल से उतर कर आ रही हूँ, कुछ धुएं थे और थे बादल बहुत से, आमिरों की शक्ल में पागल बहुत से, कुछ असीरी में बंधे थे ख़ुद ब खुद ही, पाँव भी ज़ंजीर थे सो ख़ुद ब ख़ुद ही, जाने कितने मसअलों पर तज़किरे थे, मेरी नज़रों में तो सब ही सरफिरे थे, सबके चेहरों पर अजब सी वहशतें थीं, बिन बुलाई मौत की सी दह शतें थीं, झूठ किस्से फ़स्ल की बर्बादियों के, बाँट-हिस्से अपनी कुछ आबादियों के, मैं नहीं समझी ये कैसे लोग हैं सब!! हंस रहे पर लग रहे पुर सोग हैं सब, पाँव हैं पर चल रहे बैशाखियों पर, और क़दम रख्खे हैं केवल हाशियों पर, #उर्मिलामाधव...

तेरा घर-मेरा घर

बिन दर-ओ-दीवार का घर,उसपै ये दुनियां का डर, हर तरफ शोलों की बारिश और मेरा तनहा सफ़र, साथ कोई हो भी गर तो उसके क्या मानी हुए ? क़ुदरतन ही बंट गये ये मेरा घर ये उसका घर, उर्मिला माधव

पिन्हां हुए

ग़म हमारी जिंदगी में इस क़दर पिन्हां हुए, हर जगह घेरे रहे हम यां हुए या वां हुए, लोग ये पूछा किए, ये कैसे चिपकाए गुहर? ग़म हमारे पैरहन पर इस तरह चस्पां हुए,

धता बताई

तुम्हारी फ़ितरत समझ में आई तो मैंने तुमको धता बताई, फिर अपनी सारी सहेलियों को, तुम्हारी हर इक ख़ता बताई

दाग़ ए दिल

दाग़-ए-दिल,ज़ख्म-ए-जिगर तुमको दिखाऊँ क्या क्या  रु – ब– रु हूं तो सही, और बताऊं क्या–क्या रु-ब-रु जो हूं मैं वो तुमको बताऊँ क्या क्या  तुमने इलज़ाम अभी मुझ पे लगा डाले बहुत, अपनी जानिब से तुम्हें दर्द सुनाऊँ क्या क्या, कभी काला तो कभी रंग रंगा है गंदुम सारे रंगों से अलग हटके बनाऊं क्या क्या, इक शिकायत का ज़खीरा है मेरे दामन में  बरसरे बज़्म तमाशा है जताऊँ क्या क्या...  उर्मिला माधव....

ताज कांटों का

ताज कांटों का सजाते रह गए, लोग हम पर मुस्कराते रह गए, सब लुटेरे हैं ये हम समझे नहीं, हम तो अपना घर दिखाते रह गए, सर पे चढ़के झूट ही चमका बहुत, हम मगर सच ही बताते रह गए, ज़िन्दगी दिल तोड़ कर चलती बनी, हम मुहब्बत ही जताते रह गए, दिल्लगी परचम लिए, हंसती रही,  हम हज़ारों ग़म गिनाते रह गए, उर्मिला माधव

देखो झूठी कसम न खाया करो

देखो झूटी कसम न खाया करो, सच को सच की तरह बताया करो, गर चे ख़ुद पर यकीं नहीं हो कभी, सच की क्यूं धज्जियां उड़ाया करो हम भी हर इक अदा से वाकिफ़ हैं, कम ही कुछ दून की उड़ाया करो, हम से इतना उलझना ठीक नहीं यूँ ही घर की तरफ़ न आया करो, जैसे गलियों में शोहदों की तरहा, गर चे मुमकिन है, घूम आया करो उर्मिला माधव