याद आता है
कड़े फिकरे कोई कह कर,
चला जाता था जो अक्सर,
तग़ाफ़ुल उसकी नज़रों में,
कभी देखा था जो मैंने,
वो मुझको याद आता है।।
ज़मीं जब ज़ख़्म धोती थी,
फ़लक़ रह-रह के रोता था ,
कहीं तन्हाई में जाकर,
कोई दामन भिगोता था
वो मुझको याद आता है।।
कहीं पर माँ बिछुड़ जाना,
न ये दुनियां समझ पाना,
किसी बच्चे की आँखें थीं
कहीं जब मुन्तज़िर माँ की,
वो मुझको याद आता है।।
कोई मय्यत के आगे बैठकर,
रोया नहीं हरगिज़,
मगर आरिज़ की सुर्खी,
कह रही थी,हाल अश्कों का,
वो मुझको याद आता है।।
कोई मंज़िल न थी फिर भी,
मुसलसल,चल रही थी मैं,
निशां क़दमों के दुनियां को,
नहीं दिखते थे,जाने क्यूँ,
वो मुझको याद आता है।।
उर्मिला माधव,
20.4.2016
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