इदारा निकला

कुछ अशआर
जो बुलंदी की हवाओं पे उड़े शाम ओ सहर,
उनकी तह में भी कोई ख़ास इदारा निकला,

हम जो मग़रूर रहे, ख़ुद को जुदा कर लेंगे,
तुझसे ऐ दिल न मगर काम हमारा निकला,

हमने अहबाब से जब ख़ूब गुज़ारिश करली,
इब्ने दुश्मन ही कई बार सहारा निकला,

हम खड़े होके भंवर में ही जलाते थे चराग़,
झुक के देखा तो बड़ी पास कनारा निकला,

हमको कमरे में बहुत धुंध नजऱ आने लगी,
डर के देखा तो कोई आम शरारा निकला,
उर्मिला माधव

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