दाग़ ए दिल

दाग़-ए-दिल,ज़ख्म-ए-जिगर तुमको दिखाऊँ क्या क्या
 रु – ब– रु हूं तो सही, और बताऊं क्या–क्या
रु-ब-रु जो हूं मैं वो तुमको बताऊँ क्या क्या 

तुमने इलज़ाम अभी मुझ पे लगा डाले बहुत,
अपनी जानिब से तुम्हें दर्द सुनाऊँ क्या क्या,

कभी काला तो कभी रंग रंगा है गंदुम
सारे रंगों से अलग हटके बनाऊं क्या क्या,

इक शिकायत का ज़खीरा है मेरे दामन में 
बरसरे बज़्म तमाशा है जताऊँ क्या क्या... 
उर्मिला माधव....

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