बात ऐसी
बात ऐसी मैं तुम्हें बतला रही हूँ,
ख़ास मंज़िल से उतर कर आ रही हूँ,
कुछ धुएं थे और थे बादल बहुत से,
आमिरों की शक्ल में पागल बहुत से,
कुछ असीरी में बंधे थे ख़ुद ब खुद ही,
पाँव भी ज़ंजीर थे सो ख़ुद ब ख़ुद ही,
जाने कितने मसअलों पर तज़किरे थे,
मेरी नज़रों में तो सब ही सरफिरे थे,
सबके चेहरों पर अजब सी वहशतें थीं,
बिन बुलाई मौत की सी दह शतें थीं,
झूठ किस्से फ़स्ल की बर्बादियों के,
बाँट-हिस्से अपनी कुछ आबादियों के,
मैं नहीं समझी ये कैसे लोग हैं सब!!
हंस रहे पर लग रहे पुर सोग हैं सब,
पाँव हैं पर चल रहे बैशाखियों पर,
और क़दम रख्खे हैं केवल हाशियों पर,
#उर्मिलामाधव...
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