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Showing posts from October, 2024

मिला करके देख

नज़र को नज़र से मिला करके देख, कभी ख़ुद को यां तक भी ला करके देख कभी मेरे दिल को हिला करके देख, बनाया मुझे जिसने तबियत से ख़ूबाँ, मेरे कूज़ागर से गिला कर के देख, सबाब-ए-मुहब्बत तवारीख होगी, किसी मर्ग-ए-दिल को जिला कर के देख, तुझे राहतों की भी नेमत मिलेगी  कोई चाक दामन सिला करके देख, तेरी ज़िन्दगी को ही तस्कीन होगी, कभी हक किसीका दिला करके देख.... उर्मिला माधव... 31.10.2016
हम चले ही तो नहीं बहते हुए पानी की तरफ़, उम्र भर देखा किए बस ज़िन्दगानी की तरफ़, टूट कर तनहाईयों से बात करते रह गए, हमने उम्मीदें रखीं जब इक निशानी की तरफ़, हमने दीवानों को देखा जा ब जा भटके हुए किस तरह बढ़ते गए तश्ना दहानी की तरफ़ 

बनादी गई

दांव पे सारी दौलत लगा दी गई एक महफ़िल ही दर पे सजा दी गई, अपनी तसवीर हर जा बना दी गई आईनों से हक़ीक़त छुपा दी गई, एक सीढ़ी कि जिससे गए बाम तक, भीड़ समझी गई बस हटा दी गई, उर्मिला माघव

सम्हारौ आप बस

ब्रज की दुनियां आपनें अपनों सम्हारौ आप बस, और सबकूं दै दियौ संताप बस, आपा पूती कर दई बौहार में, जाना मानी में कियौ है पाप बस, जी हमारौ खूब दूखौ है प्रभू हमई ए जो ना दियौ है साप बस, हमपै जब बर्दाश्त हरगिज ना भई तब हमारे जी कूँ चढ़गौ ताप बस, हम गुहारें राम कूँ वो कब सुनै, मन ई मन में कर रहे हैं जाप बस, उर्मिला माधवब्रज की दुनियां आपनें अपनों सम्हारौ आप बस, और सबकूं दै दियौ संताप बस, आपा पूती कर दई बौहार में, जाना मानी में कियौ है पाप बस, जी हमारौ खूब दूखौ है प्रभू हमई ए जो ना दियौ है साप बस, हमपै जब बर्दाश्त हरगिज ना भई तब हमारे जी कूँ चढ़गौ ताप बस, हम गुहारें राम कूँ वो कब सुनै, मन ई मन में कर रहे हैं जाप बस, उर्मिला माधव

ग़म नहीं

छूट जाएं आप तो कुछ ग़म नहीं, हम, हमारी ज़िंदगी कुछ कम नहीं, उम्र भर तन्हा रहे, पर क्या अजब, देख लीजै आंख भी कुछ नम नहीं, वक़्त था के आपको सुनते थे हम, खोखली बातों में अब कुछ दम नहीं, ग़म अकेले था हमारे नाम पर, अब ये आलम है कि सब कुछ, हम नहीं... उर्मिला माधव

देहरी पहाड़ हो गई

सहेलियों, आगे बाद में 😢 बाबा की बैठक, अम्मा की रसोई, बाबुल की देहरी, सब में एक आड़ होगई, वो देहरी पहाड़ होगई, घर का वो जीना, चढ़ें आवै न पसीना हर इक महीना जैसे, सावन का महीना, सब में एक आड़ होगई, वो देहरी पहाड़ हो गई, सांझ भई आंगन में, खटिया बिछा बिटिया, नानी बगल जाकें, पानी की रख लुटिया, सब में एक आड़ होगई, वो देहरी पहाड़ हो गई, सूनी दुपहरिया में, गलियों के कई चक्कर, भैया से मुठभेड़, होनी ही थी टक्कर,  सब में एक आड़ हो गई, वो देहरी पहाड़ हो गई, चुन्नी की दुनियां में  फ़्रॉक हो गई हवा, यौवन की देहरी पे, चुन्नी ही थी गवा(ह), सब में एक आड़ हो गई, वो देहरी पहाड़ हो गई, गलियों पे पाबंदी, हंसने पे पाबंदी, गाने पे पाबन्दी, नस-नस पे पाबंदी, पर सब पे आड़ हो गई, वो देहरी पहाड़ हो गई, उर्मिला माधव, 26.10.2017

किरदार बनाना होता है

चाक उसे इक बार घुमाना होता है, फिर कोई किरदार बनाना होता है, पहले दुनिया, ख़ास मुहब्बत देती है, फिर उसको मुरदार बताना होता है, दिल की कालिख ज़ाहिर करना ठीक नहीं, झूटा सच्चा प्यार दिखाना होता है, ख़्यालात की आंधी चाहे जैसी हो, दामन तो हर बार बचाना होता है,

कभी कुछ बिखर के

कभी कुछ बिखर के,कभी आह भरके  संभाला है ये दिल मुसलसल सिहर के, किसे क्या बताते अजब मुश्किलें थीं, ख़तरनाक दुनिया में गुजरी है डर के, न जाने वो क्या था समझ में न आया, के ये जिंदगानी मिली हमको मर के, मुक़द्दर था यकता ज़माने में अपना, हरे ज़ख्म लेकर फिरे दर-ब-दर के, मेरे आँसुओं से जो दामन था भीगा - चला भी गया दे के असबाब घर के, उर्मिला माधव... 2.10 2014...

पर्दा गिरा दूँ

दिल ये कहता है ज़रा सा मुस्कुरा दूँ, और तुम्हारे झूठ पे ....परदा गिरा दूँ, क्यूँ तुम्हारी आबरू पर दाग़ हो कुछ, उंगलियाँ होठों पे रख दूँ चुप करा दूँ.... उर्मिला माधव.... 24.10.2016

कोई जीता है कोई मरता है

कोई जीता है, कोई मरता है हमपे अब कुछ नहीं गुज़रता है, जाने क्या-क्या न देखा आंखों ने, ज़हन कब आंधियों से डरता है? दिल तो पथ्थर का हो गया कब का, फिर भी रह रह के आह भरता है, अब वही रहनुमा है दुनिया का, जो कि हर दिन गुनाह करता है, उर्मिला माधव

इस्लाह बोलो

मैं किसीकी क्यूँ करूँ परवाह, बोलो, एक तरफ़ा कब निभी है चाह, बोलो, जानिब-ए-मंज़िल मुझे जाना ही होगा, ज़िन्दगी भर क्यूँ तकूँ अब राह, बोलो, ज़िन्दगी को दर्द-ए-गम का वास्ता दूँ ? क्या वो आइन्दा न देगी आह, बोलो, जो मिले सौगात दे बस आंसुओं की, ये कहो कब तक करूं मैं वाह, बोलो, ज़िन्दगी मेरी में रख्खूँ या न रख्खूँ इसके मिटने पै भी लूँ इस्लाह बोलो? उर्मिला माधव... 1.10.2017

बहल जाता

तू जो आता तो दिल बहल जाता, रो रहा था ज़रा संभल जाता

वक़्त ने माना ही नहीं

हम कहाँ हैं ये कभी वक़्त ने माना ही नहीं, और फिर आप कहाँ छूटे ये जाना ही नहीं, बैठ कर देखें कहाँ सारा जहां किसका है उस पे ये दिल है हमारा के ठिकाना ही नहीं, उर्मिला माधव

उनका ख़याल आया हुआ

जा नहीं सकता कभी शीशे में बाल आया हुआ, दिल भुला देगा कभी उनका ख़याल आया हुआ जाने किस-किस शक्ल से उठती रही हैं उँगलियाँ, जैसे मेरी सादगी पर ....हो सवाल आया हुआ, ग़म शनासी की तलब करती नहीं बेचैन अब, देख लीजे ज़िन्दगी में है कमाल आया हुआ, कुछ लकीरों में रहेंगी ख़ामियां तकदीर की, आसमां देखेगा बस दिल पर मलाल आया हुआ उर्मिला माधव

बीनाई तो पाई नहीं

आँख है पर क्या करें बीनाई तो पायी नहीं, बात बढ़के हसरत-ए-दीदार तक आई नहीं, आँख से परदे हटाके,दिल की जानिब देखले, इस तरह गर्दन झुकानी क्यूँ तुझे आई नहीं?? तार दामन के बचाता है अबस ही बे खबर, इश्क़ में दीवाना होना कोई रुसवाई नहीं, जो तू मिलना चाहता है,दिलनशीं महबूब से, सर झुका कुर्बान होजा वरना शैदाई नहीं, है अनल-हक़ देख तो नज़रें घुमा कर चार सू आज अनहद बज रहा है क्या वो शहनाई नहीं? उर्मिला माधव...

हुआ क्या है अदीबों को

कटी कोई दार पै गरदन मुक़द्दर कह दिया उसको, ज़ुबां खोले अगर कोई तो बदतर कह दिया उसको, हुआ क्या है अदीबों को हक़ीक़त क्यों नहीं लिखते, हुआ गद्दी नशीं कोई ,सिकंदर कह दिया उसको मुलाज़िम है,कोई जाहिल,अगर ऊंचे महकमे का अना दिल में दबा ली और बेहतर कह दिया उसको, उर्मिला माधव

अजब मिज़ाज है अपना

अजब मिज़ाज है अपना मगर ये चाहेंगे, गुज़रता कुछ भी रहे, तुमसे हम निबाहेंगे, समझ सकोगे मगर उफ़ न बोल पाओगे तुम्हारे ग़म में कभी इस क़दर कराहेंगे, ज़माना चाहे कहे कुछ भी उसकी मर्ज़ी है अगरचे हम ही रहे हम,  महज़ सराहेंगे उर्मिला माधव

जल्दी बहुत थी

कहीं भी समय से पहुँच ही न पाई, समय को गुज़रने की जल्दी बहुत थी कभी राह में,कोई तक़रार हो ली, महज़ बे मआनी सी गुफ़्तार हो ली, उसी मसअले में गिरफ़्तार हो ली, तो मैं अपनी जानिब से चलती बहुत थी, समय को गुज़रने की जल्दी बहोत थी, उर्मिला माधव,

तू निकल के आ

कब से बुला रही हूं मैं, क़ब्र से तू निकल के आ, रोके न कोई शय तुझे, जब्र से तू निकल के आ, जब तक के तू न आएगा, देती सदा रहूंगी मैं, आंखें बिछी हैं राह में, सब्र से तू निकल के आ, उर्मिला माधव

कमाल करते हो

यार तुम तो कमाल करते हो, इश्क़ पे आंखें लाल करते हो? आंखें हंसते हुए ही जंचती हैं, इन में आंसू बहाल करते हो ? कहते फिरते थे,जान हाज़िर है, अब नहीं नज़्र-ए-हाल करते हो? झूठ कहने की ताब इतनी है ? शान-ए-सच को ज़वाल करते हो? इतने आसान हम कभी भी न थे, आज फ़िर क्या सवाल करते हो? डींग हांको, मगर ये होश रहे, सब्र किसका हलाल करते हो... उर्मिला माधव 17.10.2018

ईंट उखड़ जाती है

जब किसी क़ब्र से कोई ईंट उखड जाती है, घर की दीवार से कुछ राख़ सी झड़ जाती है, दश्त-ए-खुर्शीद से उतरी सी कोई बेचैनी , लम्बे अरसे के लिए ग़म से जकड़ जाती है, छोड़ती जाती है मेरे आगे कोई वीराना, ग़म ज़दा करके मेरे पीछे ही पड़ जाती है,  ऐसा लगता है हर इक ज़ात से हूँ वाबस्ता, वरना क्या चीज़ है जो रूह में गड़ जाती है  उर्मिला माधव

ईंट उखड़ जाती है

जब किसी क़ब्र से इक ईंट उखड जाती है, घर की दीवार से कुछ राख़ सी झड़ जाती है, दश्त-ए-खुर्शीद से उतरी सी कोई बेचैनी , ग़म ज़दा करके मेरे पीछे ही पड़ जाती है,  ऐसा लगता है हर इक ज़ात से हूँ वाबस्ता, वरना क्या चीज़ है जो रूह में गड़ जाती है, उर्मिला माधव

उम्र भर को जुड़ गए हैं

उम्र भर को जुड़ गए हैं,आपसे जज़्बात मेरे. साथ बस देते नहीं हैं,आजकल हालात मेरे, ख़ुश्क आँखों का वो मंज़र देख कर ऐसा हुआ अश्क़ लानत दे गए हैं क्या कहूँ कल रात मेरे, सोचती हूँ आख़िरश बाहर निकलकर क्या करूँ दम-ब-दम जलती ज़मीं ऑ सर पै ये बरसात मेरे, दोनों हाथों से उठा कर फेंकती रहती हूँ बाहर, हो गई घर में ग़मों की रात-दिन इफरात मेरे, भूल सी जाती हूँ मैं सब,मेरी दुनियां क्या हुई ? वहशतें सी कह रही हैं कान में कुछ बात मेरे... उर्मिला माधव

लहजा बदल गया है

वो आदमी वही है,लहजा बदल गया है, अब दरमियां हमारे,क़िस्सा बदल गया है, wo aadmii wahi hai,lahjaa badal gayaa hai, ab darmiyan hamaare qissa badal gaya hai, हम मुन्तज़िर रहे हैं,आने की कह गया था, गिनते हैं उँगलियों पर,हफ्ता बदल गया है, ham munzir rahe hain aane kii kah gaya tha, ginte hain ungliyon par haftaa badal gaya hai, लगता है कुछ कमी है,पहचान में हमारी, या वक़्त के मुताबिक चेहरा बदल गया है, lagta hai kuchh kamii hai,pahchan main hamaari, ya waqt ke mutabik chehra badal gaya hai, उल्फ़त का रंग लेकर आया हमारे दिल में, हैरत से देखते हैं, कैसा बदल गया है, ulfat ka rang lekar aaya hamaare dil main, hairat se dekhte hain,kaisa badal gaya hai, मजबूरियां हैं,तुझको,रब के किया हवाले, किस-किसको ये बताते,क्या-क्या बदल गया है... majbuuriyaan hain tujhko,rab ke kiya hawaale, kis-kis ko ye bataate,kya-kya badal gaya hai... #उर्मिलामाधव, 12.10.2015

देखते हैं

फिर से हिफ़्ज़े आबरू अब हम भी करके देखते हैं, ख़ुद के ही खूं से वज़ू अब हम भी करके देखते हैं, आदमी का क़द गिरा तो कितना छोटा हो गया, फ़िर से इसको ख़ूबरु अब हम भी करके देखते हैं, सोचते हैं अपने दिल का ढूंढ लें कोई बदल, इक ज़रा सी जुस्तजू अब हम भी करके देखते हैं, लोग कहते हैं यहां पर इश्क़ करना है सवाब, दिल बुरीदह सुर्ख़रू अब हम भी करके देखते हैं, उर्मिला माधव

अच्छी किस्मत

कैसी अच्छी किस्मत थी, चलता फिरता ख़त्म हुआ, वो भी रब की चौखट पे, गिरता-गिरता ख़त्म हुआ, उर्मिला माधव

ग़ालिब की ज़मीन पर

kis-se kya-kya kaha kare koii yun hi kab tak jalaa kare koii, zindagi bhar kii ye musiibat hai, gam se kab tak maraa kare koi, kab kahan pe ye saans ruk jaaye itna kab tak daraa kare koii, gar ye himmat jawaab de jaaye, aisii haalat main kya kare koii, apni jaanib se bas nibaah rahe, chaahe jitnaa dagaa kare koii , waqt bhii waqt par badalna hai, sabr kuchh to zaraa kare koii, aashiqii ishq ek fajiihat hai, khud ko kyun mubtila kare koii, #उर्मिलामाधव 10.10.2015

ख़ुदा ख़ुदा करके

रूह को जिस्म से जुदा करके, ख़ूब रोये यूँ......इब्तेदा करके, यूँ भी रस्मन निबाह करना था, ज़िन्दगी जी ख़ुदा-ख़ुदा करके, क़द्र करके भी देखती दुनियां, चाहते हम भी नाख़ुदा करके... उर्मिला माधव..

निभाते हुए

जब हमने बज़्म में देखा जो उसको आते हुए, किया है प्यार का दावा भी मुस्कराते हुए, वफ़ा का तज़किरा जब भी किसीने छेड़ा है, हमें भी अच्छा लगा उसकी सम्त जाते हुए, हम अपनी बात को कहते हैं अपनी तौर महज़, ज़माना हंसता रहा हमको जब सताते हुए, हमारी जान कहीं अब भी उसमें पिन्हा है, तो फिर न रंज हुआ उसका ग़म निभाते हुए, उर्मिला माधव

दीप प्रज्ज्वलित करो

अबा भी तार-तार हो, फ़लक़ भी शोलाबार हो की तर्ज़ पर--- जब ह्रदय विदीर्ण हो, स्वप्न जीर्ण-शीर्ण हो, मार्ग भी संकीर्ण हो, हारना नहीं पथिक, उठ खड़े हो वेग से, जो करो,त्वरित करो, अंधकार के समक्ष दीप प्रज्वलित करो... उर्मिला माधव...

सादगी नहीं कहते

आह को आह भी नहीं कहते, इश्क़ को ज़िन्दगी नहीं कहते, दिल को महदूद रखना अच्छा है ग़ैर से ग़म कभी नहीं कहते, गुफ़्तगू में हज़ार ख़म निकलें, उसको हम सादगी नहीं कहते, गर चे है फ़िक़्र दीनो दुनियां की, उसको आवारगी नहीं कहते, अपनी तबियत में जो फ़क़ीरी है, इसको बेचारगी नहीं कहते, फ़र्क़ समझे जो रेत पानी का, उसको हम तिशनगी नहीं कहते, उर्मिला माधव

बनारस की गलियां

मौसिक़ी की शान, बनारस की गलियां, उल्फ़त का उन्वान, बनारस की गलियां, जो भी आता यहीं का होके रह जाता, हर दिल का ज़िन्दान, बनारस की गलियां, बिस्मिल्लह जी आप हमें क्यूं छोड़ गए, कर डालीं वीरान बनारस की गलियां, मणिकर्णिका घाट हक़ीक़त कहता है, करती हैं कल्यान बनारस की गलियां, जल्वे काशी विश्वनाथ के ज़ाहिर हैं, शिव का हैं वरदान बनारस की गलियां, कोई नज़ारा कहाँ बचा इन गलियों से, पूरा हिंदुस्तान बनारस की गलियां उर्मिला माधव

याद सुहानी निकली

रात के ख़्वाब से इक याद सुहानी निकली, सोचने बैठे तो एक ख़ास निशानी निकली, ख़ुद को छोड़ा था कहीं प्यास को दरिया करते, जिस्म लगता था नया,प्यास पुरानी निकली, माह-ओ-अख़्तर भी अंधेरों के तले सोया किये, हम तो अहमक ही रहे, रात सयानी निकली, उसने एक ख़ास बदन देके हमें भेज दिया, यूँ ही दम भरते रहे, ज़ीस्त भी फ़ानी निकली, हमने मुश्किल को बहोत पास से देखा, परखा, वो मगर बन के मिरी आंख से पानी निकली... उर्मिला माधव

दास्तां कह रही हैं

हवाएं अजब दास्तां कह रही हैं, कहाँ से चली हैं, कहाँ बह रही हैं

याद सुहानी निकली

रात के ख़्वाब से इक याद सुहानी निकली, सोचने बैठे तो एक ख़ास कहानी निकली, ख़ुद को छोड़ा था कहीं प्यास को दरिया करते, जिस्म लगता था नया,प्यास पुरानी निकली, माह-ओ-अख़्तर भी अंधेरों के तले सोया किये, हम तो अहमक ही रहे, रात सयानी निकली, उसने एक ख़ास बदन देके हमें भेज दिया, यूँ ही दम भरते रहे, ज़ीस्त भी फ़ानी निकली, हमने मुश्किल को बहोत दूर तक देखा, परखा, वो मगर बन के मिरी आंख से पानी निकली... उर्मिला माधव