कोई जीता है कोई मरता है
कोई जीता है, कोई मरता है
हमपे अब कुछ नहीं गुज़रता है,
जाने क्या-क्या न देखा आंखों ने,
ज़हन कब आंधियों से डरता है?
दिल तो पथ्थर का हो गया कब का,
फिर भी रह रह के आह भरता है,
अब वही रहनुमा है दुनिया का,
जो कि हर दिन गुनाह करता है,
उर्मिला माधव
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