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Showing posts from June, 2024

संग हमने हैं जिये

क्या बताएं,किस तरह हम संग उसके हैं जिए, जब हदों के पार जाकर तंज़ उसने हैं किये, बरसरे महफ़िल,तमाशा बन गए,ये भी हुआ, बे-सबब ही,ज़ह्र के सब रंग हमने हैं पिए, होगये हलकान,अपने आपसे,लड़कर बहुत, दायरे खुशियों के रोकर,तंग हमने हैं किये, ये समझ में आ गया,महदूद रहना ठीक है, घर की अलमारी में रखके,बंद करने हैं दिये, बस के रूह-ए-ज़ेह्न में आबाद कीं तन्हाईयाँ, ख़ुद ही ख़ुद से बात करके दर्द अपने हैं जिए उर्मिला माधव, 1.7.2016

अहसास

मुश्किल तो हर रोज़ मुक़ाबिल होती है, बस उसका अहसास भुलाना होता है

उस्तादों ने काम भला कर रख्खा है

राहत इंदौरी जी के एक मिसरे से इंस्पायर्ड.. दाद लोगों की, गला अपना, ग़ज़ल उस्ताद की उस्तादों ने काम भला कर रख्खा है, सबने उनके नाम गला कर रख्खा है। शायर भी कहलाना छोटी बात नहीं, रबने सब का काम चला कर रख्खा है। क़लम चलाना ग़ैर ज़रूरी बात सही, मौसिक़ी ने बाम पे लाकर रख्खा है। उर्मिला माधव

पीछे पड़ी है

आई जो आँखों में आंसू की लड़ी है,  कितने ही बरसों से मेरे पीछे पड़ी है, उम्र भर रौशन दिए आलों में रख्खे, रात काली बा-अदब दर पै खड़ी है, अपनी जानिब से हंसूं हूं बे-तहाशा, क्या कहूँ दुनियां रुलाने पै अड़ी है, सांस है भारी ऑ इस पै टूटता दम, है यही मुश्किल कि ये मुश्किल बड़ी है, छूटती दुनियां,बिखरती जिंदगानी,  बस यही इंसान की नाज़ुक कड़ी है.... उर्मिला माधव... 20.6.2014..

एक झील ठहरी सी

एक झील ठहरी सी,गहरी सी, झांक कर चेहरा न देखो, डूब जाओगे, तुमको तैरना नहीं आता, इसकी सतह बगुलों के लिए है, शुद्ध और उजले, निर्मल कोमल, स्थायित्व है इनमे, जगह निश्चित है इनकी, ये तुम्हारी तरह नही ये मेरे वांछित समय पर स्वयं आ जाते हैं मुझे खोजना नहीं पड़ता मेरा अस्तित्व स्थाई है पर तुम्हारे चारों तरफ काई है तुम इन बगुलों की तरह धवल ह्रदय नहीं, मन मैला है तुम्हारा, दुराव रखते हो, लो मैंने आज स्वतंत्र कर दिया कोई प्रश्न नहीं पर इसका मतलब समझते रहना मुझे अब कुछ नहीं कहना शुभम... #उर्मिलामाधव 20.6.2015

समझने की भूल करली

तुम्हें समझने की भूल कर ली, तो अपनी दुन्या उसूल कर ली, लगाई तोहमत जो तुम ने झूठी, वो हमने झुक के क़ुबूल कर ली, बहार-ए-सब्ज़ा जो हक़ थी अपना, वो अपने हाथों से धूल कर ली, उर्मिला माधव 20.6.2018

नहीं जी सकते

हम मुहब्बत के सराबों में नहीं जी सकते, सच ही कहते हैं, हबाबों में नहीं जी सकते आप आलिम हैं मुहब्बत के रहें,ख़ूब रहें, यार,ख़ादिम हैं नवाबों में नहीं जी सकते, अपने जज़्बात भी चेहरे पै लिखे रहते हैं, हम वो जुमले हैं किताबों में नहीं जी सकते,  बात कहते हैं लब-ए- दम भी निभा देते हैं, झूठ या सच के जवाबों में नहीं जी सकते, दिल के बदले में दिया दिल ये कोई बात हुई, पूरे जाहिल हैं हिसाबों में नहीं जी सकते, उर्मिला माधव

क्या करूँ क्या करूँ

ग़म संभलता नहीं क्या करूँ,क्या करूँ, चाँद ढलता नहीं क्या करूँ,क्या करूँ? एक नफ़स भी ख़ुशी का न तक़दीर में, ज़ोर चलता नहीं क्या करूँ,क्या करूँ? सूरत-ए-हाल किसको दिखाना अबस, दिन निकलता नहीं,क्या करूँ,क्या करूँ? #उर्मिलामाधव.. 16.6.2015

इनकार को अदा कहिए

ये एक फिल्बदी के तहत है... ------------------------------------- उसके इनकार को अदा कहिये, दौर-ए-मुश्किल में और क्या कहिये, आगे नज़रों के जो भी आजाये, बा-अदब उसको ना खुदा कहिये, ज़िन्दगी जिस तरह भी चलती हो, शुक्रिया उसको बा दुआ कहिये , धडकनें दिल की साथ उड़ लेंगी, जश्न-ए-दौरां में बस हवा कहिये, दिल पै कितना ही कुछ गुज़रता हो, उसको हरगिज़ न बे-वफ़ा कहिये उर्मिला माधव... 19.10 2014...

आवा जाही है

जिसकी इस दिल में आवा-जाही है, उसकी उल्फ़त की वाह-वाही है, जैसे फूलों की क़द्र करता हो, उसने हर दर्द से निबाही है, वो यूँ चलता है ढल के सांचे में, जैसे ये उसकी ग़म उगाही है, उस हथेली पै अश्क़ मेरे हैं, सच मुहब्बत की ये गवाही है, यूँ समेटे हैं उसने ग़म मेरे  जैसे बस उसकी ही तबाही है.... उर्मिला माधव... 8.6.2015...