आवा जाही है
जिसकी इस दिल में आवा-जाही है,
उसकी उल्फ़त की वाह-वाही है,
जैसे फूलों की क़द्र करता हो,
उसने हर दर्द से निबाही है,
वो यूँ चलता है ढल के सांचे में,
जैसे ये उसकी ग़म उगाही है,
उस हथेली पै अश्क़ मेरे हैं,
सच मुहब्बत की ये गवाही है,
यूँ समेटे हैं उसने ग़म मेरे
जैसे बस उसकी ही तबाही है....
उर्मिला माधव...
8.6.2015...
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