संग हमने हैं जिये
क्या बताएं,किस तरह हम संग उसके हैं जिए,
जब हदों के पार जाकर तंज़ उसने हैं किये,
बरसरे महफ़िल,तमाशा बन गए,ये भी हुआ,
बे-सबब ही,ज़ह्र के सब रंग हमने हैं पिए,
होगये हलकान,अपने आपसे,लड़कर बहुत,
दायरे खुशियों के रोकर,तंग हमने हैं किये,
ये समझ में आ गया,महदूद रहना ठीक है,
घर की अलमारी में रखके,बंद करने हैं दिये,
बस के रूह-ए-ज़ेह्न में आबाद कीं तन्हाईयाँ,
ख़ुद ही ख़ुद से बात करके दर्द अपने हैं जिए
उर्मिला माधव,
1.7.2016
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