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Showing posts from July, 2025

मरहले बीमार के गए

उफ़ ज़िन्दगी के मरहले बीमार कर गए, ऐसा लगा कि ग़म का परस्तार कर गए, दामन में सिर्फ खार हैं.....पैरों में आबले, रस्ता बहुत कठिन था मगर पार कर गए , कुछ आरज़ू थी कुछ थे इरादे भी सख़्त ही, कुछ रास्ते के गम मुझे ख़ुद्दार कर गए , सब लोग क्या कहेंगे....यही डर बहुत रहा, क्या-क्या सुनेंगे हम जो अगर हार कर गए, किसको अज़ीज़ होगा ये मक़तल का रास्ता, किसको अज़ीज़ होगी कहो ये अजल की राह, हम से ही सिर फिरे हैं...जिगर वार कर गए ... उर्मिला माधव .

बिखर रही हूं

खुली बग़ावत है ज़िन्दगी से, मैं धड़कनों से मुकर रही हूं, के अब न भाती हैं सर्द आहें, मैं सब दहानों से डर रही हूं, यूँ रूह कहती है अब तड़प के, हज़ारों सदियों से मर रही हूं, ये जिस्म जैसे लहद हो मेरी, इसी के अंदर बिखर रही हूं, उर्मिला माधव 25.7.2018

देखना क्या है

देखना है कि माजरा क्या है किससे पूछें कि मुद्दआ क्या है इसमें ख़ामोशियों का काम कहाँ दरमयां दिल है फ़ासला क्या है अब तो दिन भी गुज़र गए अपने, ज़िन्दगी ख़त्म हौसला क्या है अपना बिल्कुल जुदा नज़रिया था बस तो फिर किससे राबता क्या है अब ख़यालों में कोई कुछ भी नहीं वक़्त अब मुझसे चाहता क्या है उर्मिला माधव

खलवतों का पास रख्खा

ख़लवतों का पास रख्खा उम्र भर ही, अब मुसलसल बोलना ही चाहते हैं, थक गए हैं मुट्ठियां भींचे हुए हम, अब इन्हें बस खोलना ही चाहते हैं,

दूसरी है

हमें किसी से नहीं है शिकवा, हमारी दुनिया ही दूसरी है, अलग तख़य्युल अलग इरादे कि सारी दुनिया ही दूसरी है, 

आत्मा ही दिगभ्रमित है

आत्मा ही दिग भ्रमित है,सत्य कैसे देख लोगे, स्वार्थ अंतर में निहित है,सत्य कैसे देख लोगे, दृष्टि दूषित होगई,तब व्यर्थ ही दृष्टांत हैं सब, दोष भी इच्छा जनित है,सत्य कैसे देख लोगे, व्यक्ति है स्वच्छंद,आपनी धारणा के मूल पर ही, यदि ह्रदय ममता रहित है,सत्य कैसे देख लोगे, छद्मवेषी होगया व्यक्तित्व मानव जाति का अब  गर्जना हिंसा सहित है,सत्य कैसे देख लोगे, मैं,मुझे,मेरा कहाँ तक है उचित,खुल कर विचारो, जिसमें केवल अपना हित है,सत्य कैसे देख लोगे.... उर्मिला माधव... 20.7.2014...

प्यार नहीं होना था

हादसा ऐसा हर इक बार नहीं होना था, आपके बाद कभी प्यार नहीं होना था, उसके आगोश में जाऊँ तो क़ह्र बरपा हो, उसको इस रंग से दिलदार नहीं होना था, लोग मिलते ही तमाशा सा बना देते हैं, यूँ ही हर एक का ग़मख़्वार नहीं होना था, अब मुहब्बत में भला किसने सुकूं पाया है, हमको इस ग़म का ख़रीदार नहीं होना था, अब ये बतलाइये कब कैसे चलें दुनिया में, सब ये कहते हैं, गुनहगार नहीं होना था, पता नहीं किसका है  शायद मेरा ही

कुछ और करें

हम तिरे ग़म से उबर जाएं तो कुछ और करें, तेरे ज़ीने से उतर जाएं तो कुछ और करें, अब ये तक़दीर कहीं और अगर ले जाए, इससे पहले ही न मर जाएं तो कुछ और करें, अब तो नश्शे में हुए ग़र्क़ हमें होश कहाँ रंगे उल्फ़त से जो डर जाएं तो कुछ और करें, सारी दुनिया से बहुत अच्छा भटक लेते हैं, इस जुनूं में भी जो घर जाएं तो कुछ और करें, अपनी ख़ाहिश है, जहां भर से अलग चलने की, न किसी दर पा अगर जाएं तो कुछ और करें.. उर्मिला माधव

ग़ैरों से मिल गई देखो

दुनियां ग़ैरों से मिल गई देखो, घर की बुनियाद हिल गई देखो, शब की औक़ात मुख़्तसर ही थी, ज़ख्म कितनों के सिल गई देखो.. ख़ूब शिद्दत से दिल को थामे रहे, फिर हथेली भी छिल गई देखो, एक ही दिन तो ग़ौर फ़रमाया, जो नज़र लेके दिल गई देखो, तीरगी अपने काम करती रही, रौशनी फिर भी खिल गई देखो, उर्मिला माधव,

लफ़्ज़ लिखे

लफ़्ज़ लिखे और टांग दिए दीवारों में, अपनी गिनती रखी नहीं फनकारों में, ख़ुद पढ़ते हैं ख़ुद ही खुश हो जाते हैं,  नाम हमारा छपा नहीं अख़बारों में, हमने अपने दर्द सुनाये क़ातिल को, रुसवा उसने किया खुले बाज़ारों में, घर को फूँका और तमाशा देख लिया,  कितना ऊंचा नाम हुआ दिलदारों में, दिए जला कर रखा किये दीवारों पर, रस्ता चलते रहे मगर अंधियारों में , इतने दानिशमंद कहाँ दुनिया वाले, वफ़ा ढूंढने निकले हम गद्दारों में, उर्मिला माधव 

क्या कहो

जीते ही चले जाने का मतलब है क्या,कहो, रह-रहके छले जाने का मतलब है क्या,कहो, बेबाक़ हो रहो के कहो खुल के दिल की बात,  घुट-घुटके जले जाने का मतलब है क्या,कहो, उगना सुबह-सुबह औ सुलगना तमाम रोज़, हर लम्हा ढले जाने का मतलब है क्या,कहो, खुद अपनी ज़िन्दगी को तमाशा बनाके उफ़,  हाथों को मले जाने का मतलब है क्या,कहो, दैर-ओ-हरम में जाओ करो खुद दुआ सलाम,  दांतों के तले जाने का मतलब है क्या,कहो, उर्मिला माधव... 16.7.2014...

अच्छा सनम

मैं समझती थी उन्हें अच्छा सनम, पर बुरे हैं वो बहुत,अल्ला क़सम... चाहे जो कुछ पूछती रह जाऊँ मैं, हंस दिए बस हो गया किस्सा ख़तम, है ये मुमकिन दिल में कोई और हो, ये अगर सच है तो होगा कितना गम, मैंने जब भी बात की तो "मैं"से की, क्या कहूँ अंदाज़ बस वो उनका "हम", उनकी बाबत दिल कभी सोचे अगर, दिल का हर दम ही हुआ है कोना नम... #उर्मिलामाधव... 15.7.2015

ज़िंदगी का फ़लसफ़ा

ज़िन्दगी का फ़लसफ़ा बिलकुल जुदा रख्खा गया, आदमी का आदमी से सिलसिला रख्खा गया, ज़िन्दगी में इस तरह रंगीनियाँ रख्खी गईं, जिसमें इंसानों को हरदम मुब्तिला रख्खा गया, बुत बनाया पथ्थरों से और फिर दैर-ओ-हरम, सर-ब-सजदा होने को नाम-ए-खुदा रख्खा गया, फिर अदालत भी बनी सब पर हुकूमत के लिए, पंडितों मुल्लाओं को तब नाखुदा रख्खा गया, ज़िन्दगी और मौत के जलवों से है ये क़ायनात, इन्तेहा का नाम तब फिर इब्तेदा रख्खा गया... उर्मिला माधव 

न तू देख इतने गुरूर से

न तू देख इतने ग़ुरूर से, कि मैं लौट जाऊंगी दूर से, ये पयाम तेरी नज़र को है, इसे जोड़ दिल के सुरूर से, मेरे ग़म से तू भी है, पुरअसर, मेरा दावा है मैं ग़लत नही, न तू ऐतक़ाफ़ से काम ले, आ बचा ले ख़ुद को क़ुसूर से, तू ही मेरे दिल का करार है, तुझे सोचती हूँ मैं रात दिन, मेरी शाम है तेरी जुस्तजू, है सहर भी तेरे ही नूर से, मेरे दिल का कौन हफ़ीज़ है, तेरी दूरियां ही ज़वाल हैं, ये बता कि किससे गिला करें, जो मिले हैं दर्द ग़ुरूर से, ये बयान देना पड़ा मुझे, तेरी जुस्तजू के सवाल पर, कभी ज़िन्दगी में विसाल हो, तो कहूंगी पूरे शऊर से.. उर्मिला माधव

इतनी सारी सीढियां

एक नज़्म.. देख लो ये उम्र भर की सीढियाँ हैं, तुम भी गिनके इतनी सारी सीढ़ियां चढ़ लो  तो आओ, दुनियां भर की रास्ते में उलझनें, और मुहैया हों न हरगिज़ सुलझनें, रोते-धोते दिल मसलने का ज़रा कुछ माद्दा रख लो तो आओ, तुम भी गिनके इतनी सारी सीढियां चढ़लो तो आओ, चंद खुशियों को समझ कर ख़ैरियत, ज़िन्दगी भर ज़िन्दगी से मांगनी है माज़रत, और रिसते ज़ख़्म दामन में फ़ना कर लो तो आओ, तुम भी गिनके इतनी सारी सीढियाँ चढ़ लो तो आओ, रास्ते भर बेकसी और साज़िशों के मरहले, सांस लेना मसअला फिर मसअले पर मसअले, हर क़दम पर आंसुओं का हक़ अदा कर लो तो आओ.. तुम भी गिनके इतनी सारी सीढ़ियां चढ़ लो तो आओ, मशवरा ये है हमारा ,ज़िन्दगी में रंग गढ़ लो,मुस्कुराओ, याकि गिनकर इतनी सारी सीढियां चढ़ लो तो आओ.... उर्मिला माधव..

तमाशों में इज़ाफ़ा

क्यूं तमाशों में इज़ाफ़ा हो रहा है, आदमी अपना अदब क्यूं खो रहा है। इन नई नस्लों को क्या मिल पाएगा अब, जिसको देखो वो तड़प कर रो रहा है। क्या वो सोचे जल गई हो जिसकी दुनियां, ख़ून के छींटे,मुसलसल धो रहा है। एक मुश्किल से जो छूटे गर कोई तो, बीज दूजा ज़ह्र के फिर बो रहा है। किस तरह पहुंचेंगी ये चीखें कहीं पर, कान मूंदे हर पड़ोसी सो रहा है। क्या नज़ारा और मुस्तक़बिल में होगा, जो बुरा है वो बुरा ही तो रहा है। उर्मिला माधव,

उन्सियत होती नहीं है

उंसियत होती नहीं है अब किन्हीं हालात से, इतनी नफ़रत हो गई है आदमी की ज़ात से, हर नए इनसान से अब कोफ़्त होती है हमें, दब गए हैं इस क़दर हम दर्द की इफ़रात से, इक नए अंदाज़ से आकर गले मिलते भी हैं, पर सभी किरदार हैं इक तीरगी की रात से, उर्मिला माधव..